पहाड़ों की गोद और दो दोस्तों का सपना
उत्तराखंड की शांत वादियों में बसा एक छोटा सा गाँव था—सुंदरपुर। यहाँ की हवाओं में ठंडक और लोगों के दिलों में गर्माहट थी। इसी गाँव में दो पक्के दोस्त रहते थे, रघुनाथ और दीनानाथ। दोनों का बचपन इसी मिट्टी में खेलते हुए बीता था और अब बुढ़ापा भी साथ ही आ रहा था। दोनों के परिवार सीढ़ीदार खेतों में सेब और आड़ू की खेती करके अपना गुज़ारा करते थे। रघुनाथ का बेटा था रोहन और दीनानाथ की बेटी थी सुमन। दोनों बच्चों ने गाँव के सरकारी स्कूल से लेकर शहर के कॉलेज तक की पढ़ाई साथ ही की थी।
गाँव भर में चर्चा थी कि आज नहीं तो कल, सुमन और रोहन एक-दूजे के हो ही जाएंगे। सुमन, जो स्वभाव से बेहद शांत और गृहकार्य में निपुण थी, मन ही मन रोहन को अपना मान चुकी थी। लेकिन रोहन की आँखों में गाँव के खेत नहीं, बल्कि सात समंदर पार की चमक थी। उसे लगता था कि "घर की मुर्गी दाल बराबर" है, इसलिए वह हर वक्त लंदन जाकर बसने के सपने देखता था। रघुनाथ एक साधारण किसान थे, उनकी इतनी हैसियत नहीं थी कि बेटे को विदेश भेजने का लाखों का खर्चा उठा सकें। रोहन की माँ का देहांत बचपन में ही हो गया था, इसलिए रघुनाथ उसे अपनी आँखों से दूर करने से भी डरते थे।
समझौते की नींव
कॉलेज खत्म होते ही रोहन की ज़िद ने उग्र रूप ले लिया। उसने साफ कह दिया, "बाबूजी, मुझे यहाँ की धूल-मिट्टी में नहीं सड़ना, मुझे आगे की पढ़ाई और नौकरी लंदन में ही करनी है।" रघुनाथ ने बहुत समझाया, अपनी गरीबी का वास्ता दिया, लेकिन रोहन टस से मस न हुआ। जब बात हद से बढ़ गई, तो रघुनाथ ने अपने जिगरी यार दीनानाथ को बुलाया।
दीनानाथ अपनी बेटी सुमन के भविष्य को लेकर चिंतित थे। उन्होंने सोचा कि अगर दामाद विदेश में सेटल हो गया, तो उनकी बेटी राज करेगी। दीनानाथ ने रघुनाथ के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "रघु भाई, तू चिंता क्यों करता है? हम तो समधी बनने ही वाले हैं। मैं अपनी जमा-पूँजी रोहन को दे देता हूँ। समझ ले कि मैंने सुमन का कन्यादान और दहेज पहले ही दे दिया।"
रघुनाथ की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने रोहन के सामने शर्त रखी कि पैसे तो मिल जाएंगे, लेकिन पहले उसे सुमन से शादी करनी होगी। रोहन पैसे लेने को तो तैयार हो गया, लेकिन शादी के लिए उसने एक नई चाल चली। उसने कहा, "शादी अभी नहीं काका, पहले मुझे वहाँ पैरों पर खड़ा होने दो। तीन साल बाद आकर धूम-धाम से शादी करूँगा, अभी बस सगाई कर लेते हैं।" दीनानाथ को बात थोड़ी खली, पर 'भागते भूत की लंगोटी ही सही' सोचकर उन्होंने हामी भर दी।
विदाई और अंतहीन इंतज़ार
चट मंगनी हुई और रोहन लंदन उड़ गया। सुमन की उंगलियों में अंगूठी और आँखों में सुनहरे भविष्य के सपने थे। शुरुआत में तो सब ठीक रहा। रोहन साल-दो साल में एक बार गाँव आता, तो सुमन के लिए परदेस से इत्र और शॉल लाता। पूरा गाँव सुमन को रश्क की निगाहों से देखता कि "अरे, इसे तो विलायती बाबू मिला है।" दीनानाथ का सीना भी गर्व से चौड़ा हो जाता।
समय अपनी गति से चलता रहा, जैसे पहाड़ से नदी बहती है। लगभग तीन साल बीत चुके थे। एक दिन रघुनाथ अपने बगीचे में पेड़ों की छंटाई कर रहे थे कि अचानक पैर फिसलने से वे गहरी खाई में गिर गए और उनकी मृत्यु हो गई। खबर सुनकर रोहन गाँव आया। पिता का अंतिम संस्कार किया, लेकिन उसके चेहरे पर वो दुख नहीं था जो होना चाहिए था। तेरहवीं के बाद वह कुछ दिन और रुका, फिर एक शाम सुमन के घर जाकर बोला, "सुमन, मेरा वीज़ा खत्म हो रहा है, मुझे कल ही निकलना होगा।" सुमन का दिल बैठ गया, पर उसने अपने आंसुओं को पल्लू में छिपा लिया।
लंदन पहुँचने के बाद, रोहन के फोन आने कम हो गए। हफ्तों गुजर जाते, सुमन फोन की घंटी का इंतज़ार करती रहती। वह अपने पिता दीनानाथ से अपना दुख छिपाती रही ताकि उन्हें, अपने दिल के टुकड़े को, कोई तकलीफ न हो।
विश्वासघात का गहरा घाव
एक सुनहरी सुबह, दीनानाथ अपनी छड़ी टेकते हुए रघुनाथ के पुराने सेब के बगीचे की तरफ घूमने निकले। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि एक अनजान आदमी बगीचे की बाड़ ठीक कर रहा है। दीनानाथ ने हैरानी से पूछा, "अरे भाई, तुम कौन हो? और रघुनाथ के बगीचे में क्या कर रहे हो?"
उस आदमी ने माथे से पसीना पोंछते हुए कहा, "बाऊजी, मैं शहर का रहने वाला हूँ। ये बगीचा और वो पुराना पुश्तैनी घर अब मेरा है।"
दीनानाथ के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उन्होंने कांपती आवाज़ में पूछा, "ये क्या कह रहे हो? ये तो रोहन का घर है।"
आदमी ने बेरुखी से जवाब दिया, "जी हाँ, रोहन बाबू ने ही तो जाने से पहले सबकुछ मुझे बेच दिया था। उन्होंने कहा कि अब वो इंडिया कभी वापस नहीं आएंगे, वहीं बस गए हैं।"
यह सुनना था कि दीनानाथ को लगा जैसे किसी ने उनके सीने में खंजर घोंप दिया हो। वे गिरते-पड़ते घर पहुँचे और कांपते हाथों से रोहन को फोन लगाया। जब उन्होंने घर बेचने की बात पूछी, तो रोहन ने बड़ी बेशर्मी से कहा, "हां काका, मैंने सब बेच दिया। मेरा अब वहाँ लौटने का कोई इरादा नहीं है। आप सुमन की शादी कहीं और कर दीजिये।"
बिखरे सपने और कड़वा सच
इस धोखे को दीनानाथ बर्दाश्त नहीं कर सके। जिस दामाद पर उन्हें इतना नाज़ था, उसने उनकी पीठ में छुरा भोंका था। वे समाज के डर और अपने दोस्त के बेटे द्वारा मिले इस धोखे को किसी से कह भी न सके। अंदर ही अंदर घुटते हुए, शर्मिंदगी और सदमे से कुछ ही दिनों बाद दीनानाथ भी इस दुनिया को छोड़ चले गए।
दीनानाथ के जाने के बाद सुमन बिल्कुल अकेली रह गई। घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ती गई। साहूकारों ने दीनानाथ की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया। सुमन, जो कभी रानी बनकर राज करने के सपने देखती थी, अब गाँव के स्कूल में सिलाई सिखाकर अपना पेट पालने को मजबूर थी। सालों बीत गए, रोहन की कोई खबर नहीं आई। सुमन ने भी शादी के नाम से तौबा कर ली। गाँव वाले आज भी उस पुराने, वीरान घर की ओर इशारा करके कहते हैं कि "लालच बुरी बला है"।
समय के साथ लोग बातें भूल जाते हैं, लेकिन सुमन के माथे की वो लकीरें नहीं मिटतीं जो उसके इंतजार और त्याग की गवाह हैं। रोहन का स्वार्थ था अपनी दुनिया बनाना, और दीनानाथ का स्वार्थ था 'एन.आर.आई' दामाद का ठप्पा। लेकिन इस पूरी बिसात में मोहरा बनी मासूम सुमन, जिसका कोई दोष नहीं था।
सीख:
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