किशनगढ़ की झूठी शान
किशनगढ़ की पुरानी हवेली में रहने वाले ठाकुर विक्रम सिंह का नाम पूरे इलाके में गूंजता था। पुश्तैनी रईसी थी और उस पर भी 'ठाकुर साहब' कहलाने का बड़ा भारी नशा। उनकी सोच बस एक ही धुरी पर टिकी थी—समाज में नाक ऊंची रहनी चाहिए, चाहे उसके लिए घर की नींव ही क्यों न हिल जाए। जब उनकी लाडली बिटिया, अवनि की शादी तय हुई, तो विक्रम सिंह ने ठान लिया कि ऐसी शादी करेंगे कि देखने वालों की आंखें फटी की फटी रह जाएं।
पत्नी सुमित्रा ने दबी जुबान में समझाने की कोशिश भी की, "सुनिते हो, इतना खर्च करना क्या जरूरी है? हम अपनी हैसियत में रहकर भी तो बिटिया को विदा कर सकते हैं।"
लेकिन विक्रम सिंह ने हँसकर बात टाल दी, "अरे भाग्यवान! तुम औरतों की सोच बस रसोई तक ही सीमित रहती है। यह विक्रम सिंह की बेटी की शादी है, कोई गुड्डे-गुड़िया का खेल नहीं। लोग पीढ़ियों तक याद रखेंगे कि बारात कैसी आई थी और स्वागत कैसा हुआ था।"
बादशाही शादी और खोखली वाह-वाही
तैयारियां शुरू हुईं तो पानी की तरह पैसा बहाया जाने लगा। शहर के सबसे महंगे 'शाही महल रिसॉर्ट' को बुक किया गया। निमंत्रण पत्र के साथ चांदी के सिक्कों के डिब्बे भेजे गए। बारातियों के स्वागत के लिए हेलिकॉप्टर से फूलों की बारिश करवाई गई और विदाई में हर बाराती को एक-एक सोने की गिन्नी और बनारसी साड़ियां दी गईं।
शादी के मंडप में बैठे एक मेहमान ने दावत उड़ाते हुए दूसरे से कहा, "भाई वाह! क्या ठाठ-बाट हैं। इसे कहते हैं राजा-महाराजाओं वाली जिंदगी।"
विक्रम सिंह ने यह सुना तो उनकी मूछें गर्व से तन गईं। उन्होंने पास खड़े अपने बचपन के मित्र, मास्टर दीनानाथ से कहा, "देख रहे हो दीनानाथ? नाम ही सब कुछ है। पैसा तो हाथ का मैल है, पर यह इज्जत सदियों तक रहेगी।"
मास्टर दीनानाथ, जो एक साधारण स्कूल शिक्षक थे, मन ही मन चिंतित थे। वे जानते थे कि विक्रम सिंह ने अपनी जमीनों के कागज गिरवी रखकर और बाज़ार से भारी ब्याज पर कर्जा उठाकर यह तामझाम खड़ा किया है। उन्होंने मन में सोचा, 'असली सुख तो सुकून की रोटी में है, कर्जे की घी-शक्कर में नहीं।'
जब उतरा नशे का खुमार
बेटी की डोली उठी और पूरे शहर में शादी के चर्चे हफ्तों तक चलते रहे। लोगों ने कहा, "ठाकुर साहब ने तो करोड़ों फूंक दिए।" लेकिन वाह-वाही का शोर थमते ही हकीकत ने दरवाजा खटखटाना शुरू कर दिया।
अचानक बाजार में मंदी आ गई और विक्रम सिंह का कपड़ों का थोक व्यापार औंधे मुंह गिर पड़ा। गोदामों में माल भरा रह गया और खरीदार नदारद हो गए। दूसरी तरफ, साहूकारों और बैंक वालों ने तकादा शुरू कर दिया। जो लोग शादी में विक्रम सिंह के कसीदे पढ़ते थे और झुक-झुककर सलाम करते थे, आज वही लोग उनके घर के बाहर खड़े होकर ऊँची आवाज़ में तकादा करने लगे।
समाज तो वैसे भी चढ़ते सूरज को सलाम करता है। कल तक जो 'ठाकुर साहब' थे, आज पीठ पीछे लोग उन्हें 'कर्जदार विक्रम' कहकर बुलाने लगे। रातों की नींद हराम हो गई, और घर में क्लेश का माहौल बन गया।
सच्चे मित्र की खरी सलाह
जब चारों तरफ अँधेरा छा गया और कोई रास्ता न सूझा, तो हताश और अपमानित विक्रम सिंह, मास्टर दीनानाथ के छोटे से खपरैल वाले घर पहुंचे। उनकी आँखों में आंसू थे।
"दीनानाथ! मैं बर्बाद हो गया मित्र। जिन लोगों के लिए मैंने अपनी जमा-पूंजी लुटा दी, आज वही मुझसे मुंह फेर रहे हैं। कोई मदद को तैयार नहीं। अब समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करूँ, आत्महत्या के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा," विक्रम सिंह फूट-फूटकर रो पड़े।
दीनानाथ ने उन्हें पानी पिलाया और बड़े प्रेम से समझाया, "मेरे भाई! अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत? लेकिन हिम्मत मत हारो। देखो विक्रम, झूठी शान के लिए कर्जा लेना अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। दिखावे से वाह-वाही मिल सकती है, सम्मान नहीं। असली सम्मान तो रिश्तों को निभाने और ईमानदारी से जीने में मिलता है।"
दीनानाथ ने आगे कहा, "बड़े-बड़े महलों से जिंदगी नहीं चलती। सयाने कह गए हैं—तेते पाँव पसारिए, जेती लांबी सौर। अगर तुमने अपनी चादर देखकर पैर पसारे होते, तो आज यह दिन न देखना पड़ता।"
सादगी में ही सच्चा सुख
मित्र की खरी और सच्ची बातों ने विक्रम सिंह की आँखों पर पड़ा अहंकार का पर्दा हटा दिया। उन्होंने उसी दिन अपनी जीवनशैली बदलने का निर्णय लिया। उन्होंने अपनी बड़ी हवेली और महंगी गाड़ियां बेचकर सारा कर्जा चुकाया और शहर के बाहरी इलाके में एक छोटे से मकान में रहने चले गए।
विक्रम सिंह ने अब दिखावा छोड़कर मेहनत करना शुरू किया। वे एक छोटी सी दुकान संभालने लगे। शुरुआत में लोगों ने बातें बनाईं, लेकिन विक्रम की ईमानदारी और मेहनत देखकर धीरे-धीरे समाज में उनकी खोई हुई इज्जत वापस आने लगी। अब वे रात को चैन की नींद सोते थे, क्योंकि सिर पर न तो कर्जे का बोझ था और न ही किसी दिखावे का दबाव।
एक शाम दीनानाथ से मिलते हुए विक्रम ने हाथ जोड़कर कहा, "मित्र, अगर उस दिन तुम मुझे सही राह न दिखाते, तो शायद मैं दिल के दौरे से मर जाता या खुद को खत्म कर लेता। आज मुझे समझ आया है कि रूखी-सूखी खाकर ठंडे पानी के साथ जीने में जो आनंद है, वो दिखावे के छप्पन भोग में नहीं।"
सीख: असली इज्जत और सुख सादगी में है, झूठे दिखावे में नहीं। इंसान को अपनी चादर देखकर ही पैर पसारने चाहिए, क्योंकि दिखावे की चमक अक्सर इंसान को अंधेरे खाई में धकेल देती है।
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