मंदिर के प्रांगण में नई उम्मीद
दोपहर की धूप अब थोड़ी मद्धम पड़ चुकी थी। गाँव के शिव मंदिर के विशाल प्रांगण में आज महिलाओं की भारी भीड़ जुटी थी। बरगद के पेड़ के नीचे बिछी दरी पर गाँव की 'जागृति महिला मंडल' की अध्यक्ष, निर्मला काकी बैठी थीं। उनके चेहरे पर एक गंभीर लेकिन सौम्य तेज था। उनके सामने बैठी थीं गाँव की कई गृहणियां, जिनमें सुधा भी शामिल थी। सुधा अपनी साड़ी के पल्लू को उंगलियों में लपेट रही थी, मन में एक अजीब सी घबराहट थी। उसे लिखना बहुत पसंद था, लेकिन आज तक उसने अपनी डायरी के पन्ने किसी को नहीं दिखाए थे। आज मंडल की ओर से 'मेरी कहानी, मेरी जुबानी' प्रतियोगिता का ऐलान होने वाला था।
निर्मला काकी ने अपना चश्मा ठीक किया और गला खंखारते हुए बोलना शुरू किया,
"अरी ओ सखियों! जरा ध्यान से सुनो। हम सब जानते हैं कि तुम सबके पास कहानियों का खजाना है, जैसे दादी की संदूक में पुरानी साड़ियाँ होती हैं। लेकिन इस मंच पर अपनी बात रखने के कुछ नियम हैं, ठीक वैसे ही जैसे अचार डालने का अपना एक तरीका होता है।"
नियमों की कसौटी
सुधा ने कान खड़े कर लिए। निर्मला काकी ने अपनी भारी आवाज़ में कहना शुरू किया, "देखो, अगर इस प्रतियोगिता में भाग लेना है, तो कहानी में 'गागर में सागर' भरने जैसा हुनर होना चाहिए। शब्दों की संख्या कम से कम 700 होनी चाहिए। मतलब यह कि बात अधूरी न रहे, दिल की बात पूरी तसल्ली से कहो, ताकि पढ़ने वाले की रूह तक पहुँचे।"
पास बैठी रमा ने धीरे से सुधा को कोहनी मारी, "अरी, 700 शब्द! इतना तो मैं पूरे दिन में अपने सास-ससुर से भी नहीं बोलती।" सुधा मुस्कुरा दी, लेकिन उसका ध्यान काकी की बातों पर ही था।
काकी ने आगे कहा, "और सुन लो, कहानी बिल्कुल ताजी होनी चाहिए, जैसे सुबह की पहली रोटी। कहीं और छपी हुई या सुनाई हुई बासी कहानी मत ले आना। हमें वो चाहिए जो आज तक तुम्हारे मन के तहखाने में बंद थी।"
विश्वास और सब्र की परीक्षा
माहौल में थोड़ी खुसुर-पुसुर होने लगी। निर्मला काकी ने हाथ उठाया, "तीसरी और सबसे जरूरी बात—यह तुम्हारी बेटी की विदाई की तरह है। एक बार कहानी यहाँ भेज दी, तो परिणाम आने तक उसे किसी और जगह, किसी और पत्रिका या फेसबुक पर मत डाल देना। अगर ऐसा किया, तो समझो तुम्हारी मेहनत पर पानी फिर गया। एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं, वैसे ही एक कहानी दो जगहों पर नहीं चल सकती।"
सुधा सोच में पड़ गई। उसने अपनी कहानी 'अधूरी ख्वाहिशें' कल रात ही पूरी की थी। उसे लगा जैसे काकी उसी से बात कर रही हों।
काकी ने इनाम की पोटली की ओर इशारा करते हुए कहा, "विजेता दस चुने जाएंगे। पहले तीन को नकद इनाम और सम्मान मिलेगा, जैसे मायके से मिली हुई भेंट। बाकी सात को डिजिटल प्रमाण पत्र मिलेगा, जो यह साबित करेगा कि तुम्हारी कलम में दम है। लेकिन याद रखना, 'उतावला सो बावला'... किसी भी तरह की पूछताछ यहाँ सबके सामने हल्ला करके मत करना। जो पूछना हो, चुपचाप बाद में अकेले में या चिट्ठी लिखकर पूछ लेना।"
पर्दे के पीछे की मेहनत
भीड़ में से एक महिला, कांता, जो हमेशा शक करती थी, तुनक कर बोली, "काकी, पिछली बार विमला को इनाम मिला था, मुझे तो लगता है सब मिलीभगत है।"
निर्मला काकी ने उसे कड़ी नज़र से देखा और शांत स्वर में बोलीं, "कांता, 'सांच को आंच नहीं'
फिर उन्होंने अपनी टीम की ओर इशारा किया, जो पीछे बैठी पर्चियाँ सहेज रही थीं। "और देखो, ये मेरी सहयोगी बहनें दिन-रात मेहनत करती हैं, जैसे घर की नींव दिखाई नहीं देती पर घर उसी पर टिका होता है। तुम्हारी कहानी छपने में 24 से 48 घंटे लग सकते हैं। 'सब्र का फल मीठा होता है', तुरंत हायतौबा मत मचाना। अगर फिर भी देर हो, तो बेझिझक आकर पूछ लेना।"
आखिरी हिदायत
अंत में निर्मला काकी खड़ी हो गईं। "जाते-जाते एक बात गाँठ बाँध लो। कहानी भेजने से पहले अपनी मात्रा और वर्तनी जाँच लेना। जैसे मेहमानों के सामने जाने से पहले हम अपना श्रृंगार देखते हैं, वैसे ही कहानी को भी सजा-संवार कर भेजना। और हाँ, एक ही कहानी भेजना, पर ऐसी भेजना कि पढ़ने वाले की आँखों में आँसू आ जाएं।"
सुधा ने एक गहरी साँस ली। उसके मन का डर अब संकल्प में बदल चुका था। उसे समझ आ गया था कि यह केवल एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को, अपनी दबी हुई आवाज़ को दुनिया के सामने लाने का एक अनुष्ठान है। वह उठी और मंदिर की सीढ़ियों पर सिर झुकाकर घर की ओर चल दी, अपनी कहानी को एक नई पहचान देने के लिए।
सीख: अनुशासन और धैर्य किसी भी रचनात्मक कार्य की नींव होते हैं। नियमों का पालन करने से ही हमारी प्रतिभा को सही मंच और सम्मान मिलता है।
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