अधिकार प्रेम पर - रोनिता कुंडु
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अधिकार प्रेम पर - रोनिता कुंडु

भैया... मैं तो दो तल्ले सोने का झुमका लूंगी, एक लौती बुआ हूं इसकी, अब इतना तो हक बनता है और नामकरण मेरे दिए हुए नाम से ही संपन्न होगा, तो कम में कैसे छोड़ दूं तुम्हें? सोनम ने अपने भैया जतिन को उसके बेटे के नामकरण पर कहा।

प्रभा जी: अरे बेटी! तूने कुछ नाजायज मांग नहीं की जो इतनी सफाई दे रही है। तेरे भैया अपनी बहन को नहीं देंगे तो किसे देंगे? जतिन, तू एक काम कर इसके हाथ में झुमके के पैसे ही रख दे, तुझे तो पता ही है इसे किसी और के दिए हुए डिजाइन पसंद तो आएंगे नहीं, एक बार खरीद कर फिर पसंद ना आने पर वापस करना, इन सब झंझटों से अच्छा है यह अपनी पसंद का ही एक बार में ले ले।

जतिन: मां क्यों इतने लोगों के सामने मेरा मजाक उड़ा रही हो? अभी एकदम से इतने पैसे कहां से लाऊं? आप क्या नहीं जानती डिलीवरी में कितना खर्च हो गया है? अरे उन पैसों की भरपाई कैसे करूंगा यही सोच रहा हूं और आप लोगों की अपनी ही पड़ी है।

सोनम: हां भैया अब तो यही कहोगे! भाभी को देते वक्त तुम करोड़पति बन जाते हो, बस सारी कंगाली मेरे सामने ही बाहर आ जाती है। मेरी ही गलती थी जो बोलकर अपनी जुबान खराब की। रहने दो मम्मी, मेरे ससुराल में कोई कमी है क्या? वह तो बहन का अधिकार समझकर मांग लिया।

प्रभा जी: अरे बेटा यही यूंही ज़माना नहीं कहता घर का बेटा तब तक ही बेटा और भाई रहता है जब तक बहू नहीं आ जाती, तेरा भैया भी क्यों अलग बनेगा? अपनी रस्में पूरी कर, वैसे तू क्या लाई है अपने भतीजे के लिए?

सोनम: लाना तो बहुत कुछ चाहती थी मम्मी! पर फिर सोचा अभी तो यह छोटा है, सोना चांदी से ज्यादा अभी इसके लिए खिलौने कपड़े महत्वपूर्ण है, तो ले आई या झुनझुना और यह कपड़ा, एक बार यह बड़ा हो जाए, देखना क्या देती हूं इसे? तब यह देखेगा और समझेगा पापा और बुआ में अंतर, अभी तो जो भी दूंगी भाभी ही तो हड़प लेगी, सोनम ने फुसफुसाकर अपनी मम्मी से कहा... सोनम की फुसफुसाहट इतनी भी धीरे नहीं थी कि कोमल सुन ना सके, पर उसने इस बात को अनसुना करना ही बेहतर समझा। यह बात खत्म हो गई और नामकरण का अनुष्ठान भी। लगभग 1 साल बीत गया और दो दिनों बाद जतिन के बेटे का पहला जन्मदिन था। नामकरण का अनुष्ठान इतनी धूमधाम से नहीं हो पाया था, तो जतिन अपने बेटे का पहला जन्मदिन बड़े ही धूमधाम से मनाने वाला था। सारे रिश्ते नाते दारो को नेवता दिया गया, तो प्रभा जी ने सोनम को फोन लगाया और कहा बेटा, आज ही आ रही हैं ना? देख मेहमानों जैसे मत आना, एक हफ्ते रुक कर जाना। बेटा, तू आती है तो मेरा मन लगता है, वरना इस घर में पूछने वाला ही कौन है?

सोनम: हां मम्मी! अब मेरा भी मन नहीं करता उस घर में जाने का? भाभी की हुकूमत देखकर मेरे भी सीने पर सांप लोटता है, पर जाना तो पड़ेगा, भले ही भैया पर अब मेरा कोई अधिकार नहीं है पर आप पर तो है, पता है मम्मी इन्होंने मुझे कहा कि मुन्ने को कोई सोने का सम्मान दे दो, पर फिर मैंने ही मना किया जब भैया ने अपना सारा लेनदेन का अधिकार खत्म कर दिया, फिर क्यों मैं महान बनूं? सोने के भाव वैसे भी आसमान पर है और मेरे पैसे भी फालतू नहीं है।

प्रभा जी: हां हां सही किया! दामाद जी से कहकर अपने लिए झुमका ही बनवा ले। क्योंकि अब तेरे भैया से तो इसकी उम्मीद ही छोड़ दे, अच्छा छोड़ यह सब आ कब रही है यह बता?

सोनम: हां 12:00 बजे तक आ जाऊंगी।

सोनम के आते ही प्रभा जी बड़ी खुश हो जाती है और तुरंत मां बेटी कमरे में चली जाती है। ना तो वह मुन्ने को देखती हैं और ना ही उसके बारे में पूछती है, कोमल, सोनम के इस रुखे व्यवहार को समझ जाती है, क्योंकि इन 1 साल में सोनम ने उसे सुनाने का कोई मौका नहीं छोड़ा था। थोड़ी देर बाद कोमल सोनम के लिए चाय नाश्ता लेकर आती है।

सोनम: भाभी! मेरे लिए चाय लेकर आई? मुझे तो लगा अब इस घर में मुझे कोई पूछेगा भी या नहीं? वैसे जब तक मम्मी है तब तक यही आऊंगी, फिर तो क्या मायका क्या परिवार?

कोमल: सोनम, आप हमेशा ही ऐसे क्यों बोलती हो? जबकि आपके भैया आपसे कितना प्यार करते हैं! बस एक झुमका नहीं दे पाए तो अापने उनको पराया ही कर दिया?

सोनम: भाभी, मैं उतनी लालची नहीं! मेरे पति ने मेरे लिए कोई कमी नहीं रखा है, वह तो बस अपने अधिकार के लिए लड़ रही हूं अब आप ही देख लो इतनी बड़ी पार्टी भैया रख सकते हैं, पर मेरे लिए ही उनके पास पैसे नहीं होते और उनसे क्या ही कहूं? आपने ही सिखाया होगा वरना मेरे भैया ने आज तक मुझे कभी मना नहीं किया।

कोमल: अधिकार कैसा सोनम? जिसने कभी आपको मना नहीं किया वह अगर कभी आपको मना करते हैं तो वह कितने मजबूर होंगे यह सोचा है कभी आपने? मेरी पूरी प्रेगनेंसी कॉम्प्लिकेशन से भरी रहीं, उनका काफी खर्च हो गया और यह कोई बहाना नहीं आप चाहे तो आपके पूरे बिल दिखा सकती हूं, पर उस दिन से आपने ऐसा अपना व्यवहार बनाया के इनको हर दिन यह एहसास होता रहा कि यह एक अच्छे भैया नहीं है, पता है उनकी यह हालत देखकर मैंने इनसे कहा भी कि, आप मेरा कोई गहना तुड़वाकर आपको झुमका दिला दे, पर यह भी उन्हें गवारा नहीं हुआ। उन्होंने कहा भी के जल्दी आपको झुमका दिलाएंगे, पर कितने अफसोस की बात है ना सोनम? आजकल सारे रिश्ते नाते बस लेनदेन पर ही सीमित हो गए हैं, अधिकार जताने वाले काफी मिलेंगे पर अधिकार को समझने वाले कम और मम्मी जी, सोनम अभी छोटी है पर आप तो उसे समझा सकती है ना? ऐसी कौन सी चीज़ है जो सोनम ने अपने शादी पर मांगी और उन्होंने नहीं दी? पर वह तो सनम का अधिकार था? क्या बहन का अधिकार बस यही होता है? अपने भैया की तकलीफ समझ कर उसकी मदद करना यह बहन का अधिकार नहीं है? सोनम, आज से आपको शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा, वह शाम को अापका झुमका ले आएंगे।

कोमल के इस बात से दोनों मां बेटी स्तब्ध रह गए और सोनम को आत्मग्लानि ने घेर लिया, फिर वह प्रभा जी से बोली, मम्मी, मैंने भैया को कितना गलत समझा और आपने भी मुझे नहीं रोका? नहीं चाहिए मुझे झुमका, मुझे मेरा मायका चाहिए शायद एक यही भी कारण है के माता-पिता के जाने के बाद बेटियों का मायका भी चला जाता है। हमेशा भैया भाभी ही खराब नहीं होते, बहनों की भी गलती होती है कभी-कभी। असल में बचपन से अधिकार जमाते जमाते उनकी आदत इतनी बुरी हो जाती है कि वह समझ ही नहीं पाती है, के वह कब गलत चली गई? भाभी, माफ कर दो मुझे, भैया से भी माफी मांगूगी मैं।

प्रभा जी: बस कर सोनम! तेरी कोई गलती नहीं है, अब एक बहन अपने भाई से नहीं मांगेगी तो किस मांगेगी? यह तेरी भाभी चिकनी चुपड़ी बातें करने में माहिर है, तुझे इसकी बातों में आने की कोई ज़रूरत नहीं, यह तो चाहती है कि तू इसकी बातों में आ जाए और तेरे बदले इसकी अलमारी भरती रहे। कोमल तू इसे तो बहला सकती है, पर मुझे नहीं। सोनम, तेरी मां जिंदा है अभी, मैं भी देखती हूं तेरा अधिकार कैसे कोई छिनता है, शाम को जतिन सोनम के लिए झुमका ले आया, तो सोनम उसे लेने से इनकार करने लगी और अपने बर्ताव के लिए माफी मांगने लगी, तभी प्रभा जी ने कहा, अब मना क्यों कर रही है? यह तेरा भाई है, और तुझे तेरा हक दे रहा है, एहसान नहीं कर रहा है और याद रख जब हक अपने आप ना मिले, तो छीन कर लेना पड़ता है। तेरी भाभी से पूछ क्या वह अपना हक छोड़ देगी? इसकी बातों में तू आ सकती है, मैं नहीं, ले यह झुमका और पार्टी में इसे ही पहनना, वहां सारे चुप थे फिर किसी ने कुछ नहीं कहा और पार्टी अच्छे से हो गई। पार्टी के बाद वाले दिन सोनम ने अपनी मम्मी से कहा, मम्मी, मैं अब अपने ससुराल नहीं जाऊंगी। यह मुझे बात-बात पर घर से निकल जाने को कहते हैं, तो मैंने भी कह दिया अब मैं नहीं जाऊंगी, मम्मी आपके बाद भैया को तो यह घर मिल जाएगा, आपने मेरे लिए कभी कोई घर क्यों नहीं बनाया?

प्रभा जी: यह सब क्या बोले जा रही है? बेटियों के लिए घर कौन बनाता है? उनका तो ससुराल ही उनका अपना घर होता है और यह क्या बात हुई भला? दामाद जी से जरा सी झड़प क्या हुई तूने वहां न जाने का ही फैसला कर लिया?

सोनम: मम्मी! आपको नहीं पता वह कितना सुनाते हैं मुझे? मैं कुछ नहीं जानती मुझे आप एक घर लेकर दो, क्योंकि यह हक है मेरा, आप अगर नहीं देंगी तो आपका मेरा रिश्ता खत्म।

प्रभा जी: तू तो ऐसे बोल रही है मानो घर ₹2 में मिलता हो? उसके लिए अपना सामर्थ्य भी तो होना चाहिए. और अच्छा खासा बसा बसाया पति का घर छोड़ तुझे अलग घर चाहिए? हर वक्त अपनी जिद चलाना अच्छी बात नहीं समझी और तेरा रिश्ता सिर्फ सामानों के साथ है क्या?

सोनम: क्यों मम्मी? जब यही जिद में भैया से कर रही थी झुमके के लिए, तब तो आपने और बढ़ावा दिया और कहा अपना हक छीन कर लेना चाहिए, उस वक्त भी भैया या सामर्थ्य से बाहर था झुमका देना, फिर भी उन पर दबाव बनाती रही, तब तो आपको बुरा नहीं लगा? पर जब यही जीद आपसे कि मैं तो आपको गलत लगा और खुद ही बोल दिया कि मेरा रिश्ता सामानों से है क्या? फिर आपने कभी यह क्यों नहीं सोचा मेरा मायका आपके बाद भैया से है ना कि सामानों से? मुझे तो अपनी गलती का एहसास पहले ही हो चुका था और अब शायद आपको भी हो गया हो।

प्रभा जी अब खामोश थी, फिर सोनम जतिन और कोमल को वह झुमका लौटा कर कहती है, भैया, भाभी, मुझे अपने रिश्ते में चमक चाहिए, इन सोने चांदी के चमक बस कुछ दिन के लिए होते हैं, पर प्यार की चमक के आगे सब फिक लगते हैं, अब से आप लोगों के प्यार पर मेरा अधिकार होगा और इसमें मैं कोई कंजूसी बर्दाश्त नहीं करूंगी।

कोमल: सोनम, क्या सच में विनय जी ने तुम्हारे साथ ऐसा व्यवहार किया है?

सोनम: अरे नहीं भाभी! उनकी इतनी हिम्मत कहां जो मुझे घर से निकाले? वह तो मम्मी की आंखें खोलने के लिए उन्हें विलन बनाना पड़ा।

सभी हंस पड़ते हैं, फिर जतिन भी सोनम को वह झुमका देकर कहता है, मेरी बहन कोई फरमाइश करें और उसका भाई पूरा ना करें यह तो हो ही नहीं सकता, यह तो छोटे एक झुमके की बात है, तेरे लिए तो जान भी हाजिर है, दोनों भाई-बहन गले लग जाते हैं, और प्रभा जी के आंखों में पछतावे के आंसू बहने लगते हैं।

दोस्तों, आप बताना क्या अधिकार सिर्फ सामानों पर होना चाहिए? रिश्ते को संभाले रखने के लिए हमें सामानों की माया छोड़ जिम्मेदारी को निभाने की जरूरत हैं, सामने वाले की तकलीफ समझ उनको ग्लानि मुक्त रखना चाहिए,.तभी एक अच्छी मिसाल के साथ एक स्वस्थ रिश्ता निभेगा। कभी-कभी माता-पिता अपने रहते ही, कुछ ऐसे बीज बोकर जाते हैं, जिनका भुगतान बेटियां उनके जाने के बाद तक करती ही रहती है। अगर रिश्तो में सिर्फ प्यार का लेनदेन रहे, तो हर रिश्ता हमेशा से ही एक जैसा ही रहेगा।

धन्यवाद

रोनिता

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