अपना ही सिक्का खोटा - शुभ्रा बैनर्जी
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अपना ही सिक्का खोटा - शुभ्रा बैनर्जी

सुमित्रा जी को सभी रिश्तेदारों ने समझाया था,कि पहले बेटी के हांथ पीले कर दें।बेटे की शादी हो ही जाएगी। सुमित्रा जी को यह मंजूर नहीं था।बड़ी बेटी के लिए अच्छा वर मिलते ही सात साल पहले शादी कर चुकी थीं वे।अब इकलौते बेटे की बहू आने पर ही छोटी बेटी ब्याहेंगी,ऐसी उनकी जिद थी।

पति,इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करते थे।उन्हें पता था शायद,घर की शांति,गृह लक्ष्मी की बात मानकर ही कायम रह सकती है।बेटे की शादी को उत्सुक मां,अब लड़की के संधान में लग चुकीं थीं।एक दोपहर सुमित्रा जी की दिखानी,जो कि वहीं दूसरे मोहल्ले में रहतीं थीं,आईं और बोलीं"देख छोटी बहू,एक लड़की का पता चला है।ज्यादा दूर नहीं,यहां से तीस किलोमीटर पर ही लड़की की बुआ रहतीं हैं।लड़की बड़ी लाड़ली है अपने बुआ- फूफा की।शादी के लिए वो भी लड़का ढूंढ़ रहें हैं।हां एक अड़चन है ,लड़की के पिता नहीं हैं।लड़की घर की बड़ी बेटी है।स्कूल में नौकरी करती है।बुआ के यहां आती है हर दशहरे-दीवाली में।अब देख ले तू।हमारे खानदान में अभी तक कोई मास्टरनी नहीं आई।पांच भाई -बहनों में बड़ी इस लड़की के ऊपर अपने मां और भाई -बहनों की जिम्मेदारी भी है।हां,दिखने में बहुत सुंदर है।जैसी तेरी इच्छा थी,एकदम रांगा बहू(गुड़िया सी) बनेगी।अगर तू कहे,तो चल हम दोनों एक बार जाकर मिल आतें हैं,बुआ से।"

सुमित्रा जी कल्पना को साकार होते देख गदगद हो गईं।जिठानी को गले लगाकर कहा" दीदी,ये आपने बहुत अच्छी खबर सुनाई।अच्छा ये हुआ कि, किसी और को नहीं पता है।हम बिना किसी को बताए चलतें हैं एक दिन।तुम खबर भिजवा दो।उन्हें अगर आपत्ति ना हो ,तो देख आएं हम औरतें पहले।"जिठानी और देवरानी एकमत हुईं और ज्ञात ठिकाने पर पहुंच गईं।लड़की के फूफा जी नामी डॉक्टर थे,सो घर ढूंढ़ने में कोई परेशानी हुई नहीं।बुआ से मिलकर और लड़की की फोटो देखकर ही सुमित्रा जी ने दिखानी की तरफ देखकर,इशारे से कुछ निर्देश दिया।वे पहले से तैयार थीं,लड़की को बुलवाने की बात कही।अब बुआ ने असलियत बताई"दीदी,लड़की,सुंदर होने के साथ-साथ कुशाग्र भी है।घर का सारा काम जानती है।उसकी एक ही शर्त है ।" सुमित्रा जी और उनकी जिठानी का माथा ठनका।बुआ ने आगे कहा"भाई साहब बहुत पहले स्वर्ग सिधार गए।हमारी लड़की स्कूल में पढ़ाकर और ट्यूशन करके घर चलाती है।गहने और आवश्यक दान सामग्री के अतिरिक्त कुछ दे नहीं पाएंगे हम।यह उसकी भी शर्त है।"

सुमित्रा जी को आश्चर्य बिल्कुल भी नहीं हुआ।यह तो स्वाभाविक ही था। उन्होंने भी तुरंत जवाब दे दिया" हमें कुछ नहीं चाहिए।परिवार को जोड़े रखें बस,और कुछ नहीं।अपने बच्चों को उचित शिक्षा दे पाए।यह मेरी शर्त थी।आप बुलवा लीजिए।हम परिवार के सभी सदस्यों के साथ आएंगे ,बात पक्की करने।"

आनन-फानन में लड़की को बुलवाया गया ,मां के साथ। सुमित्रा जी,अपने पति,बेटा,बेटी,जिठानी और उनके बेटे-बहू के साथ पहुंची।पहली नजर में ही उन्हें पसंद आ गई शुभा।हां,जिठानी की बहू ने चेताया था," चाची,मास्टरनी है लड़की। सोच-समझकर हां करिएगा।"

सुमित्रा जी को पता नहीं,शुभा की आंखों में क्या दिखा था।सर पर हांथ रखकर बस इतना ही कहा" मुझे अपनी मां ही समझना।तुम्हारे साथ मैं हर क्षण खड़ी रहूंगी।"शुभा के लिए,यही सबसे बड़ा कारण था,हां करने का।शादी में अपने वचन अनुसार सुमित्रा जी ने कुछ नहीं लिया।बहू की मुंहदिखाई में जब उन्होंने अपने पड़ोस की सहेली को कहा" मां ने बहुत कष्ट सहकर पाला है ,अपने बच्चों को।इतनी शिक्षा दी है,वही सबसे बड़ा धन है।"सास के लिए सदा से नकारात्मक भाव सुन-सुनकर, शुभा आज स्तब्ध रह गई।जो महिला अपनी बहू की मां का सम्मान कम नहीं होने देती,वह सास नहीं मां ही होती है।शुभा ने भी परिवार को अपना लिया था।

लगभग साल भर होने को आए,छोटी बेटी के लिए कोई रिश्ता पक्का ही नहीं हो पा रहा था।अब सुमित्रा जी की चिंता बढ़ने लगी।बेटे से जब भी कहती इस बारे में,वह टाल देता।कान भरने में अब बड़ी बेटी भी शामिल हो गई थी।एक दिन सुमित्रा जी ने भी स्वयं,बहू को बेटे को फटकार लगाते सुना था।सोचना स्वाभाविक हो गया कि,बहू तेज है।मास्टरनी है ना।ऊपर से सुंदर,नचा रही होगी पति को।गलती तो खुद की थी ही,विवाह योग्य बेटी की शादी पहले ना कर।रिश्तेदार भी अब ताना मारने लगे थे।एक दिन बेटे के नौकरी पर जाते ही,अपने स्वभाव के विपरीत बहू की पेशी कर दी"बहू ,कब तक तुम लोग अनजान बने रहोगे?घर में एक विवाह योग्य बहन है,यह तो तुम्हारे पति को दिखता नहीं।मैंने सोचा था,तुम समझदार हो । जिम्मेदारी पता है तुम्हें,गलत थी मैं।ऐसा जादू चलाया है तुमने मेरे बेटे पर,कि नजर मिलाकर बात भी नहीं करता।सब ठीक ही कहते थे,मत लाओ बहू।बेटी को ब्याह दो पहले।नहीं,मैं तो पुत्र मोह में अंधी हो गई थी।बहू को देखकर पिघल गई थी।अब खुद ही जो अपनी किस्मत पर लात मारी है,तो भोगना तो पड़ेगा।अरे,तुम तो लड़की हो,एक लड़की का भला नहीं सोच सकती?सोनिया सही कहती हैं कि ,तुम्हारी आंखों ने मुझ पर भी काला जादू कर दिया था।दामाद जी तैयार हैं साथ चलने को,पर भाई तो आगे बढ़कर कोई रिश्ता ढूंढ़े।"

सास की वेदना से अनभिज्ञ नहीं थी,शुभा।छोटी ननद थी भी बहुत अच्छी।हमउम थी,तो शुभा की सहेली बन गई थी।पति से इसी बात पर बहस होती थी शुभा की,कि बहन की शादी के बारे में गंभीर हों।कब ससुर के जमा पैसे खत्म हो जाएंगे,पता भी नहीं चलेगा।अपनी शादी में अनावश्यक खर्चे देख चुकी थी वह।

पति(सुमित) ने उसे चुप करवाते हुए कहा"तुम्हें हर चीज में बोलने की बीमारी है ना!बहन तुम्हारी है या मेरी?अरे ,ऐसे किसी का भी हांथ पकड़ कर शादी करवा दूं अपनी बहन की?मैं क्या दुश्मन हूं उसका?तुम्हें आए कितने दिन हुए?जीजाजी भी तो कब से खोज रहें हैं?वो इस परिवार से तुमसे पहले जुड़े हैं।थोड़ा अपनी भावनाओं पर काबू रखा करो।भगवान जब चाहेगा,तब होगी शादी।तुम्हारे चीखने -चिल्लाने से कुछ नहीं होने वाला।अपनी उम्र देखो,कितनी शादियां करवाई है अब तक तुमने?हर चीज को व्यक्तिगत लेने की जरूरत नहीं।अभी मैं हूं।मां को तो दीन-दुनिया की कोई खबर है नहीं।कोई कुछ बोला,बस चढ़ बैठेंगी भेजने के लिए।अब तुम उनके गुस्से में घी मत डाला करो।समझाया करो कि,मैं कितनी दौड़-धूप कर रहा हूं।"

शुभा को बस इसी झूठ से चिढ़ थी।पति को आड़े हांथ‌ लेते बोली" कब गए थे आखिरी बार लड़का देखने बहन के लिए?ख़ुद की शादी के पहले ना?मां तो नहीं गई थीं।जीजाजी के साथ देख आए,और आते ही फरमान सुना दिया,कि लड़का ठीक नहीं।अरे बूढ़े हो रहें हैं मां-बाबा।जवान लड़की को घर पर बिठाकर ,पानी की तरह हर तीज त्यौहार में पैसा लुटाना क्या शोभा देता है?रोज़ बाहर का नाश्ता,खाना,उपहार करते-करते पूरी पूंजी खत्म हो जाएगी।तुमने बचाया है कुछ बहन के लिए,नहीं ना।तो शादी अब दो या दो साल बाद दो।पैसों की व्यवस्था तो करके रखनी पड़ेगी।तुम सीधे सीधे बोलो,कब जाओगे,सीमा चाची के बताए लड़के को देखने? साथ में मैं भी चलूंगी।"

" अरे बाप रे!अब यही बचा है।घर की बहू ढैंग ढैंग करती भागेगी यहां वहां,तो लोग तो हमारे खानदान पर ही खोट निकालेंगे न।मैं हूं,जीजाजी को बुलवा लेता हूं।दशहरे के बाद चले जाएंगे।"

" नहीं,अभी जाना पड़ेगा।जीजाजी को बुलवा लो।शुभा ने गुस्से से तमतमा कर कहा।

सुमित्रा जी अपने कमरे में बैठी थीं। बहू-बेटे की बात सुनाई तो नहीं दे रही थी,पर उस वार्तालाप में महिला का स्वर तेज था।बस शुरू हो गई होगी बहू।बेटे की तो जान निकलती होगी,उसके सामने बात करने में।कोसते हुए रोने लगीं"वाह रे बहू!मेरा बेटा अपनी बहन की शादी करना चाहता है,पर तुझे बड़ी तकलीफ़ होती है।अरे तुझसे फूटी कौड़ी भी नहीं मांगेंगे हम।मन ना हो तो चले जाना मायके।पर मेरी बच्ची की शादी तो तय हो जाने दे। ड्यूटी से आते ही चढ़ बैठती है उस पर।शांति से खाना तक नहीं खा सकता आजकल।",

शुभा को समझने में जरा भी देर नहीं लगी,कि उन्हें‌ नाटक का एक रूप ही दिखाई दे रहा है।बेटा तो सगा है,अपना है।बहू तो ठहरी पराई।वो तो चाहेगी,ना हो शादी।

सास और बहू के बीच शीत युद्ध आरंभ हो चुका था।छोटी ननद बिचारी,दोनों पक्षों को प्यार से समझातीं।अब शुभा ने ही मैरिज ब्यूरो का दरवाजा खटखटाया।तुरंत कुछ अच्छी तस्वीरें छोटी ननद की खिंचवाई।दूर की मौसी सास को इस काम में लगा दिया।चौथे दिन ही फोन आया सासू जी के पास,कि लड़के के जीजा,और भाई आ रहें हैं देखने।बेटे के तो होश उड़ गए।अगर पक्की हो गई तो, खर्च कैसे पूरा होगा?तुरंत जीजाजी को बुलवा लिया गया।अब पूरा घर उनके परामर्श का आभारी था।उन्होंने जाने के लिए सहमति तो दे दी,पर यह भी कहा कि यदि लड़का हमारी लड़की के योग्य नहीं हुआ ,तो बात शुरू भी नहीं होगी।तय समय पर जीजा जी और साले साहब निकले।रात आठ बजे वापस आएं।शुभा और शुभा की सास(सुमित्रा जी)कब से रास्ता देख रहें थे।

आते ही सबकी नजरें दामाद भगवान पर टिकीं,तो उन्होंने चाय -पानी पीकर व्याख्यान देना शुरू किया।"घर पूरा पक्का नहीं।लड़के की मां विधवा है तो ,सादा खाना बनता है।भूंसे पैरे से खाना बनता है।खेती -बाड़ी है थोड़ी।लड़का होमियोपैथी डॉक्टर है।कितना ही कमाता होगा?ये जोड़ी कहीं से भी जमती नहीं दिखी।"

शुभा भी पीछे हटने वाली नहीं थी।बड़ी ननद और ननदोई के जाते ही बड़ी मुश्किल से पति को मनाकर रामपुर पहुंची,पति के साथ ।बहुत अच्छी आवभगत की उन लोगों ने।कुछ पक्का ,कुछ कच्चा था घर।रसोई दो थे।मां विधवा थीं ,अपना खाना खुद बनातीं थीं।एक ही बेटा था,जो प्रैक्टिस करता था।जैसा रंग रूप,वैसा ही खानदानी व्यवहार।शादी में ना करने की कोई वजह ही नहीं‌ थी।शुभा ने आकर सास-ससुर से बताया दामाद की समस्त जानकारी।

अगले ही दिन,शायद बड़े दामाद ने फोन पर कह दिया,शादी नहीं‌‌ हो सकती।पति खुश ।शुभा खुश नहीं थी।पति से कारण जानना चाहा, विवाह ना करने का।अब सुमित्रा जी भी बहू के पक्ष में बोल रहीं थीं।सुमित जब सामना नहीं कर पाते,तो अपने जीजा को बुलाते।जीजाजी सहदीदी उपस्थित हुए।आते ही घर का माहौल अजीब सा लगा। सुमित्रा जी ने सब को आराम करने को कहा।

शुभा को कुछ सूझ नहीं रहा था।तभी बड़ी ननद ने एक दांव खेला"मां,भाभी जानबूझकर ऐसा घर देख रही है।उन्हें क्या पता नहीं‌ हमारा रहने सहन।ये बस अपना बोझा उतारना चाहतीं हैं किसी तरह।गरीब घर की लड़की की सोच भी तो छोटी ही रहेगी।"सुमित्रा देवी असमंजस में तो थीं,क्या करें कुछ सूझ नहीं‌ रहा था।हां अब भी एक बात जरूर बोलना नहीं छोड़ रहीं थीं,कि बहू नहीं चाहती ननद की शादी हो।

शुभा के लिए ननद की शादी जिम्मेदारी नहीं थी,पर ननद के प्रति अत्यधिक संवेदनशील थी वह।भगवान के पास खड़े होकर केवल सत्य मांग रही थी शुभा।आधी रात नीचे रसोई से पानी सुराही में भरने के लिए गई,तो देखा पति(सुमित)बड़ी ननद और ननदोई एक कमरे में बैठे मंत्रणा कर रहें हैं।समझ तो सकती थी ,पर दरवाजे पर कान लगाया (पाप मानकर भगवान से माफी मां ली)

जो सुना उससे तो शुभा के होश‌ उड़ गए।अपनी मां के जाए बेटा और बेटी ,दामाद से सलाह मांग रहे थे।मां को कैसे बहू के खिलाफ भड़काया जा सके।लड़के देखने का कार्यक्रम अनवरत चलता रहेगा,पर उसमें भाई की उपस्थिति वर्जित रहेगी।भाई भी गला फाड़कर कह रहें थे"देखते तो हैं आप,मेरी कोई बात सुनती है भला।मां ने इस मास्टरनी को मुझ पर छड़ी घुमाने के लिए चुना है।हर मामले में अपनी सलाह।अरे भाई-बहन मां -बाप तो बात कर रहें हैं ना।"

शुभा की आंखें बरस पड़ीं,दुख से नहीं अपमान से।जब एक पति के मन में अपनी पत्नी के लिए सम्मान ही नहीं,तो और क्या आधार है।सोच लिया ,नहीं अब नहीं पड़ूंगी बीच में।जब मुझे पराया ही मानते हैं ,तो मैं क्यों घुसुं इन झमेलों में अकारण।

अपने कमरे की तरफ जाते हुए,उसने सासू मां को,उन तीनों की तरफ आते देखा।उसकी सांसें रुकने लगीं।एक मां को जब यह पता लगेगा कि उनका ही खून साजिश में रत हैं,वो तो मर जाएगीं।जैसे ही हांथ पकड़कर अपने कमरे में ले जाने लगीं,हांथ झटककर खिड़की के पीछे खड़ी हो गईं।अब असमंजस में शुभा थी।ना कुछ सुन पा रही थी ना देख।सासू मां को बुरा ना लगे सोचकर ,वह वहीं खड़ी रही।अंदर बातें हो रहीं थीं,बाहर एक मां का सीना जल रहा था।आंखों से पीड़ा पिघल रही थी।कुछ देर बाद ही वे अपने कमरे में चलीं गईं।

शुभा ने पहले ही अपने अधिकांश गहने(बहुत ज्यादा तो थे नहीं।ननद को देने के लिए निकालकर रखें थे।उसकी शादी में गहनों का इंतजाम हो जाने से बहुत राहत मिलेगी।मेरे भाग्य में होगा,तो पहन ही लूंगी। बातचीत समाप्त करके पति देव कमरे में आए,और एक नजर भी उठाई शुभा की तरफ।हां,शुभा को एक पोटली में गहने भरते देख भड़क कर बोले"देखो शुभा खबरदार।इन गहनों को हांथ भी मत लगाना तुम।ये मेरी भाग्यलक्ष्मी हैं।पूरे गहने देते समय तुम्हें ये भी ख्याल नहीं आया कि उन्हें क्या दोगी?"

शुभा ने इतना ही कहा" जब मेरे बच्चे होंगे,तो उनके पिता खरीद देंगें।ये मेरे पिता के पैसों के हैं।किसे देना है,नहीं देना है मेरा निर्णय रहेगा,और किसी का नहीं।"

सुमित अपनी पत्नी की बेवकूफी पर रोएं या हंसे।एक आध तोले का कोई गहना बनवा लेते,ये सारा देना क्यों?और अभी तो बात ही पक्की नहीं हुई।

शुभा ने बताया "ये गहने मैं मां के कमरे में रख देती हूं।छोटी भी वहीं होती है।मैं अपने हांथ से उन्हें दूं,तो शायद अच्छा ना लगे उन्हें।"

पत्नी का मानसिक संतुलन पूरी तरह नष्ट हो चुका है,समझ चुका था सुमित।तब तक शुभा मां को देने वाले गहने जमा कर अपनी अलमारी में ही रखी।कल मां को दे देगी।

शादी भगवान की अशेष कृपा से ठीक हो गई।बारात आई जब द्वार पर, सुमित्रा जी ने गले लगा लिया बहू को,और मन से बहुत -बहुत आशीर्वाद दिया।लगन बारह बजे का था।ननद को सजाया जा रहा था।शुभा को अब गहनों का ख्याल आया।सास से पूछा देने के लिए। सुमित्रा जी ने तो कह दिया कि तुमने मुझे दिया ही नहीं।बोला था जरूर,पर मुझे दिया नहीं।

शुभा जाकर अलमारी खंगालने लगी,पर गहने हों तो ना मिले।

भाभी ने गले के जोर पर गहना देने की बात कही,और अब गहने गायब।सभी ने बहू के चरित्र पर लांछन लगाना शुरू किया। तिलमिला उठी थी शुभा।सारे लोग कमरे में थे,पर पति देव और ननदोई नहीं थे।किसी से कहकर दोनों को ऊपर बुलवाया।शुभा ने सीधे शब्दों में पूछा पति से"गहने कहां रखें हैं तुमने?अभी नाटक करने का समय नहीं।लग्न शुरू होने वाला है।गहने दो जल्दी।" पति ढीठ बनकर पूड़ी और सब्जी खा रहे थे,साथ देने के लिए थे जीजाजी।शुभा ने अब अपना रौद्र रूप धरा,"आखिरी बार पूछ रहीं हूं,कहा हैं गहने?मुझसे कोई अघटन मत करवाना ।सीधे बता दो,लगन का समय है।"

मैंने लिया ही नहीं,तो क्या बताऊंगा?मां के सामने महान बनने का शौक है ना तुम्हें।चोर -चोर चिल्लाने से ही चोरी साबित नहीं होती।" प्रमाण कहां है?मां के लाड़ले बेटे ने जैसे ही कहा,बेटे के गाल पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ पड़कर,लाल रंग छोड़ दिया।सभी अवाक हो गए।मां तो बेटे के दोष ढांकने में माहिर थीं।बहू को ही दोषी बनाया है हमेशा।मां ने बस बेटे से कहा" मेरे पैर छूकर कसम खाकर कह,गहने तू नहीं जानता।पुरानी परंपराओं को मानने वाले परिवार के इस पुत्र ने दूर से मां के सामने की जमीन छूकर प्रतिज्ञा की,"मैं नहीं जानता मां,गहने कहां हैं?"

तभी ननदोई जी शुरू हुए"देखो !शुभि तुम ना कभी कभी अति करती हो।अरे तुम्हारे गहने नकली थे क्या,ऊंचा गला करके ननद को दोगी,ढिंढोरा तो पीट दिया,पर अब साजिश करके दादा को फंसा रही हो।कितनी अपराधिक प्रवृत्ति है तुम्हारी।दादा को तो एकदम निढाल कर दिया तुमने शुभि।छवि:छि:।

वो मेरी भी बहन जैसी है।इतनी चालाक हो सकती हो तुम,हम तो सोचे भी नहीं थे।खैर तुम ये मत समझना कि गहने ना होने से बारात वर लेकर वापस चली जाएगी।मैं वादा करता हूं,इसी मंडप में छोटी की शादी होगी, सुयोग्य पात्र के साथ।"

अब शुभा के पास कोई शब्द ही नहीं थे।चोरी के अपराध से मढ़ तो दिया गया है,अब नहीं रुकूंगी इस घर में।अब तक यह मेरा घर नहीं बन पाया।

शुभा कमरे से रोते हुए निकलने लगी तो, सुमित्रा देवी दहाड़ीं"ऐ लड़की,तुम अपने आप को क्या समझती हो?भगवान हो,वैद्य हो,अपनी ननद की मां हो?क्या हो तुम।तेरे स्पष्टवादिता के गुण ने मुझे तुममें कोई और एक गुण देखने ना दिया।तू यहीं बैठ ननद के पास।अभी फैसला हो जाएगा शादी होगी या नहीं।"

" हां सुमित ,तू मेरा ही खून है ना?तेरी दीदी भी है।रही बात जमाई साहब की,उनकी सोच अलग है।मेरे पैर छूकर बोला तूने,कि गहने तेरे पास नहीं। नहीं-नहीं पैर छूकर बोला।"सुमित की टांगें कांपनी लगी।" चुप नालायक,मैं मां हूं तेरी।तेरी आंखों में अपनी बीवी का डर दिखता है मुझे।शुभि स्पष्टवादी है, साफ-साफ बोलती है।तेरी छोटी बहन की शादी में बहुत मांग की गई थी गहनों की,तभी शुभि ने अपने गहने देने की इजाजत मांगी थी मुझसे,एक बहन के नाते।अब मैं कैसे मान लूं कि वही चुराई है।

तुम लोगों की दूसरी साजिश सुनकर तो मैं और दंग हो गई।क्यों दामाद जी?आपकी बहुत पहले से इच्छा थी,छोटी से अपने भाई की शादी करवाने की।मुझे यह मंजूर नहीं था,तभी बता दिया था।और अब आप ,आपकी पत्नी और मेरा नालायक बेटा मिलकर बहू के खिलाफ ही साजिश रच रहे हो।गहने इसलिए छिपाए गए,ताकि बारात गुस्साए और शादी हो ही ना।तब उस समय तुम भगवान बनकर अपने भाई के साथ मेरी बेटी की शादी करवा दो।इतनी बेवकूफ नहीं हूं मैं,कि हीरा और कोयला में अंतर ना कर सकूं।शुभि ने तुम्हारी पहले की सारी साजिशें उजागर कर दीं,तभी अपमानित मान रहे थे ना खुद को।मेरा अपना बेटा,बहू को तेज लड़ाकू,झगड़ैल , बिगड़ैल बताकर मेरी नज़रों से गिराता रहा।

भगवान की कृपा से,कल तुम तीनों की बात मैंने सुनी।गहनों के बारे में मैं जिद नहीं कर सकती,पर एक वचन देती हूं।यह बारात अगर वापस गई,मैं छोटी को साथ लेकर पुरी के आश्रम में वास करूंगी।"

बेटे ने झट से गहनों की पोटली मां के हाथों दी।छोटी को सजाया गया शुभि के द्वारा ही।ससुराल पक्ष के लोग इतने गहनों की चमक में आश्चर्यचकित हो गए।छोटी की शादी निर्विघ्न संपन्न हुई।सत्य की जीत हुई,साजिश सारा।

शुभ्रा बैनर्जी



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