रेत के टीलों के बीच बसा स्वाभिमान
राजस्थान के जैसलमेर जिले की सरहद पर, जहां दूर-दूर तक सिर्फ सुनहरी रेत का समंदर नजर आता था, वहां एक छोटी सा गाँव बसा था—'रामगढ़'। यह गाँव बिल्कुल भारत-पाकिस्तान सीमा से सटा हुआ था। यहाँ की जिंदगी आसान नहीं थी; पानी की किल्लत और तपती धूप में यहाँ के लोग या तो ऊंट पालते थे या फिर बाजरे की सूखी रोटियों पर गुजारा करते थे। बंटवारे और सरहद के तनाव के कारण गाँव के कई परिवार पलायन कर चुके थे, लेकिन गाँव के सबसे बुजुर्ग, बाबा रामकिशन, अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए।
बाबा रामकिशन गाँव के पुराने मंदिर के पुजारी थे। जब सबने जाने की बात की, तो उन्होंने अपनी लाठी जमीन पर पटकते हुए कहा था, "अरे, जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होती है। मेरे पुरखों की राख इस मिट्टी में मिली है, मैं अपनी कुलदेवी और अपने आँगन को छोड़कर कायरों की तरह नहीं भागूँगा।"
बाबा रामकिशन के इस अडिग फैसले के कारण उनका बेटा और उनका पोता 'सूरज' भी वहीं रुक गए। हालाँकि गाँव के आसपास की ढाणियों में रहने वाले अन्य समुदाय के लोग बाबा का बहुत सम्मान करते थे, क्योंकि बाबा सबके सुख-दुःख के साथी थे।
सपनों की उड़ान और खाकी वर्दी का मोह
सूरज बचपन से ही अलग मिट्टी का बना था। जब भी सीमा सुरक्षा बल (BSF) की गाड़ियाँ रेत के टीलों से गुजरतीं, सूरज अपना खेल छोड़कर उन्हें सलामी ठोकता। उसके मन में एक ही धुन सवार थी—फौजी बनना। वह अक्सर अपनी माँ से कहता, "माँ, देख लेना, एक दिन तेरा सूरज भी उस वर्दी को पहनेगा और तुझे जीप में बिठाकर घुमाएगा।" माँ बस मुस्कुरा देती और उसकी बलाएं ले लेती।
बाबा रामकिशन ने सूरज के सिर पर हाथ रखकर समझाया था, "बेटा, फौज की नौकरी सिर्फ ताकत से नहीं, जिगर से होती है। तुझे खूब पढ़ना होगा।" सूरज ने गाँठ बाँध ली। वह दिन में ऊंट चराता और रात को ढिबरी की रोशनी में पढ़ाई करता। उसका संकल्प पक्का था—चाहे एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़े, वह देश की सेवा जरूर करेगा।
मातम में बदली खुशियां
साल बीते और वो दिन आ ही गया। सूरज सेना में भर्ती की परीक्षा देने के लिए जोधपुर शहर गया हुआ था। उसके पीछे गाँव में एक काली रात आई। सरहद पार से कुछ घुसपैठियों ने गाँव पर हमला बोल दिया। उनका निशाना वो पुराना मंदिर और बाबा रामकिशन का घर था। उस रात गोलियों की आवाज ने रेगिस्तान की खामोशी को चीर दिया।
जब सूरज खुशी-खुशी अपनी परीक्षा पास करके गाँव लौटा, तो उसे सन्नाटा मिला। उसका घर, जो कभी हंसी-ठिठोली से गूंजता था, अब श्मशान बन चुका था। बाबा रामकिशन और उसके माता-पिता, सभी को बेरहमी से मार दिया गया था। अपने परिवार की जलती चिताओं को देखकर सूरज का खून खौल उठा। उसकी आँखों से आंसू नहीं, अंगारे बरस रहे थे। उसने मुट्ठी भर रेत उठाई और कसम खाई, "जब तक एक-एक दुश्मन को चुन-चुन कर नहीं मारूँगा, मेरी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। अब यह लड़ाई मेरे देश की भी है और मेरे परिवार की भी।"
प्रतिशोध की आग और रणभूमि की पुकार
सूरज का चयन सेना में हो गया। ट्रेनिंग के दौरान उसका जुनून देखकर उसके साथी भी दंग रह जाते। उसके लिए अब जीवन का एक ही मकसद था—दुश्मनों का संहार। कुछ ही समय बाद सरहद पर तनाव बढ़ा और युद्ध की स्थिति बन गई।
सूरज अभी नया रंगरूट था, इसलिए उसे पीछे की टुकड़ी में रखा गया। लेकिन सूरज का मन नहीं माना। वह अपने कमांडिंग ऑफिसर के पास गया और आँखों में आँसू लिए बोला, "साहब, मेरा घर इसी सरहद पर था। उन्होंने मेरा सब कुछ छीन लिया। मुझे आगे जाने दीजिए, मुझे अपने घर और देश, दोनों का कर्ज चुकाना है।"
सूरज की आँखों में प्रतिशोध और देशभक्ति की ऐसी ज्वाला थी कि अधिकारी मना नहीं कर सके। उसे अग्रिम मोर्चे पर भेज दिया गया।
तिरंगे की शान और अंतिम सांस
रेगिस्तान की ठंडी रात में दुश्मन ने अचानक हमला बोल दिया। सूरज की पोस्ट पर भारी गोलीबारी हो रही थी। सूरज ने अपनी पोजीशन संभाली और मशीनगन से दुश्मनों पर कहर बनकर टूट पड़ा। उसे अपने बाबा का चेहरा याद आ रहा था। उसने अकेले ही कई दुश्मनों को ढेर कर दिया।
तभी, एक दुश्मन सैनिक ने पीछे से आकर सूरज पर वार किया। पीठ में गहरा घाव लगा, लेकिन सूरज गिरा नहीं। राजपुतानी खून उफान पर था। उसने पलटकर दुश्मन की गर्दन पकड़ी और गरजते हुए कहा, "कायरों! तुम लोग हमेशा पीठ पीछे ही वार करना जानते हो, लेकिन हम वो हैं जो छाती पर गोली खाते हैं।"
सूरज ने अपनी आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी और उस पोस्ट को दुश्मनों के कब्जे में जाने से बचा लिया। जब तक कुमुक (backup) पहुँची, सूरज अपना काम कर चुका था। उसने अपनी जेब से तिरंगा निकाला और कांपते हाथों से उसे पोस्ट पर लहरा दिया। फिर वही रेत, जिसमें उसका बचपन बीता था, उसे अपने माथे से लगाया और बुदबुदाया, "बाबा, मैंने अपना फर्ज निभा दिया..."
सूरज ने हंसते-हंसते अपने प्राण त्याग दिए। वह वीरगति को प्राप्त हुआ, लेकिन जाते-जाते हमें यह जिम्मेदारी सौंप गया कि जिस आजादी में हम सांस लेते हैं, उसकी कीमत हमारे वीरों के लहू से चुकाई गई है।
सीख: एक माँ सिर्फ अपने बच्चे को जन्म नहीं देती, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व को गढ़ती है जो समय आने पर 'घर' और 'धरा' (धरती) दोनों के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर सके। अपना कर्तव्य निभाना ही सबसे बड़ा धर्म है।
