बदनसीब बाप - आरती कुशवाहा

बदनसीब बाप - आरती कुशवाहा

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“नंदू… उठ जा बेटी… देख, तेरे बाबा आ गए हैं… आँख तो खोल…”

राघव चौधरी स्ट्रेचर पर सफ़ेद चादर से ढँकी उस काया से लिपटकर रो रहे थे। उनकी सूखी उँगलियाँ चादर के किनारे को बार-बार पकड़कर छोड़ देतीं, जैसे यक़ीन ही न हो कि भीतर लेटी देह अब कभी नहीं जागेगी।

पास खड़ी नर्स ने हल्के से पूछा,

“आप कौन हैं, सर? मरीज से आपका क्या रिश्ता है?”

राघव के होंठ काँपे, शब्द गले में फँस गए।

वो क्या कहते? कैसे कहते कि जो इस चादर के नीचे सोई है, वही उनकी…

उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा,

“सिग्नेचर करना है तो कागज़ दीजिए… बाकी कुछ मत पूछिए।”

और फिर वही—छाती कूटकर, नाम पुकार-पुकारकर, वे इतने फफक कर रोने लगे कि पूरे इमरजेंसी वार्ड का माहौल गमगीन हो गया।

वहीं बैठी एक लड़की अपनी माँ की साड़ी का किनारा मुट्ठी में भींचे सब देख रही थी।

बारह साल की उस बच्ची की आँखों में डर था, सदमा था और एक अनजाना सवाल—

“माँ क्यों नहीं उठ रही…

उस लड़की का नाम तारा था।

और चादर के नीचे उसकी माँ—नंदिनी।



राघव चौधरी कभी शहर के बड़े वकील हुआ करते थे। कस्बे के पास वाली तहसील में उनका खूब नाम था—चौधरी साहब की दलीलें, चौधरी साहब का रुतबा, चौधरी साहब का तिलकधारी माथा।

पुराना बड़ा-सा मकान था—ऊँची छतें, चौकोर आँगन, बीच में नीम का पेड़।

पत्नी कमला, बेटा हर्ष, बेटी नंदिनी—छोटा मगर खुशहाल परिवार।

नंदिनी इन सबकी आँखों का तारा थी।

राघव उसे प्यार से “नंदू” बुलाते, और मोहल्ले वाले कहते,

“चौधरी साहब, आपकी लड़की तो आपसे भी तेज़ दिमाग की निकलेगी देखना।”

नंदिनी को बचपन से ही गीत-संगीत का शौक था। किताबों से ज़्यादा वो संगीत के नोट्स में खोई रहती। स्कूल के हर फंक्शन में उसकी आवाज़ ही मंच पर गूँजती।

राघव को ये सब “शौक के लिए” तो ठीक लगता था, पर वे हमेशा कहते,

“पढ़-लिखकर अफ़सर बनेगी मेरी बेटी। चौधरी की बेटी हारमोनियम लेकर गलियों में नहीं घूमेगी।”

नंदिनी मुस्कुराकर कहती,

“बाबा, हारमोनियम गलियों में नहीं, मंचों पर बजेगा। और आपका नाम भी साथ में अनाउंस होगा।”

राघव उसकी बातों को मज़ाक समझकर टाल देते।

समय बीतता गया। नंदिनी कॉलेज पहुँची।

उधर शहर से एक युवा संगीतकार, आर्यन, कस्बे में कुछ वर्कशॉप लेने आया।

कॉलेज के कार्यक्रम के लिए नंदिनी को एक लोक-धुन पर गाना था, और आर्यन उसके लिए संगत कर रहा था।

पहली मुलाक़ात…

पहला सुर…

पहली सराहना…

धीरे-धीरे ये सुर दोस्ती में बदले, दोस्ती अपनापन बन गई।

नंदिनी को पहली बार लगा—कोई उसके संगीत को, उसके भीतर के सपनों को, उसी तरह समझता है जैसे वह खुद समझती है।

कॉलेज के आख़िरी साल में एक दिन नंदिनी ने हिम्मत जुटाकर राघव से कहा,

“बाबा, मैं आगे म्यूज़िक में करियर बनाना चाहती हूँ। शहर में एक बड़ा संस्थान है, वहाँ से ट्रेनिंग लूँगी।…”

राघव अख़बार के पीछे से झाँककर बोले,

“करियर बनाना है तो लॉ कर, पीसीएस की तैयारी कर। ये गाने-बजाने वाली दुनिया भरोसे लायक नहीं होती।”

नंदिनी ने धीरे से कहा,

“और अगर मैं इसी में कुछ बन जाऊँ तो? ऐसे कितने लोग हैं जो संगीत से ही घर चलाते हैं…”

“दूसरों के लिए जो अच्छा है, ज़रूरी नहीं हमारे लिए भी हो,” राघव ने बात काट दी,

“चौधरी की बेटी तमाशों में नहीं नाचेगी, बस!”

कमला ने बीच में कहा,

“ज़रा नर्म-नरमी से भी तो समझा सकते हो, लड़की है आपकी…”

राघव ने उन्हें घूरकर देखा,

“मैं बाप हूँ उसका, दुश्मन नहीं। जो कह रहा हूँ, उसके भले के लिए कह रहा हूँ।”

लेकिन नंदिनी के भीतर संगीत सिर्फ़ शौक नहीं, साँस बन चुका था।

वो चोरी-छुपे आर्यन की क्लास में जाती, उससे रागों के बारे में सीखती, रियाज़ करती।

कुछ महीनों बाद उसने घर में अगली बात रखी—

“मैं आर्यन से शादी करना चाहती हूँ।”

कमरा एकदम सन्नाटे में डूब गया।

“आर्यन… ये वही लड़का जो कॉलेज में ढोलक लेकर घूमता था?” राघव ने आँखें तरेरते हुए पूछा।

“वो सिर्फ़ ढोलक नहीं बजाता बाबा,” नंदिनी ने कहा,

“वो संगीत रचता है। उसके अपने कंपोज़िशन हैं, उसे एक स्टूडियो में काम भी मिल रहा है। वो मुझे बराबर समझता है, मेरे काम का सम्मान करता है।”

“कहाँ का रहने वाला है? कौन हैं उसके माँ-बाप? खानदान क्या है?” राघव के सवाल बाण की तरह निकले।

“मध्यप्रदेश का छोटा-सा गाँव है। पिता किसान थे, अब नहीं रहे। माँ सिलाई करके घर चलाती हैं,” नंदिनी ने सच-सच बताया।

राघव भड़क उठे,

“मतलब न घर-हवेली, न दौलत, न खानदान! और तू उसके साथ झोपड़ी में गीत गाती फिरेंगी? चौधरी की बेटी होकर यह फैसला लिया है तूने?”

नंदिनी ने आँखों में आँसू रोकते हुए कहा,

“मैं झोपड़ी में नहीं, अपने सपनों के घर में रहूँगी बाबा। आप सोचते हैं गरीबी कोई गाली है, पर मेरे लिए वो ईमानदार मेहनत का दूसरा नाम है।”

“बस!” राघव की आवाज़ गूँज उठी,

“अगर उस लड़के से शादी की तो इस घर से तेरी विदाई नहीं, तेरी अर्थी निकलेगी मेरे लिए।

सोच ले नंदिनी, बाप चाहिए या वो ढोलकिया!”

कमरा घूम गया नंदिनी के लिए।

उसने आखिरी उम्मीद से माँ की ओर देखा। कमला की आँखें डबडबा चुकी थीं, पर वो पति के सामने कुछ कह न पाईं।

रात भर नंदिनी जागती रही।

सुबह होते-होते उसने अपना निर्णय ले लिया।

अगले ही हफ़्ते कोर्ट में नंदिनी और आर्यन ने चुपचाप शादी कर ली।

वापस आकर उसने राघव के चरण छुए,

“बाबा, आपने मना किया, मैंने फिर भी गलती की। सज़ा देनी हो तो दे दीजिए, पर मुझे श्राप मत दीजिए। मैं आज भी आपकी बेटी हूँ।”

राघव ने पैर पीछे खींच लिए।

“हमारी कोई बेटी नहीं है। जिस दिन तूने हमारी इज़्ज़त से बड़ा अपना मन कर लिया, उसी दिन हमारे लिए मर गई।”

कमला वहीं बिखर गईं,

“ये क्या कह रहे हो आप…?”

पर राघव अडिग रहे।



नंदिनी और आर्यन शहर के एक छोटे-से किराए के मकान में रहने लगे।

जीवन आसान नहीं था—किराया, खाना, गैस, और बीच-बीच में काम की अनिश्चितता। पर एक दूसरे का साथ था, संगीत था, उम्मीद थी।

धीरे-धीरे आर्यन को जिंगल्स, छोटे-छोटे गानों के काम मिलने लगे।

नंदिनी बच्चों को संगीत सिखाने लगी, फिर कुछ स्कूलों में पार्ट-टाइम म्यूज़िक टीचर भी बन गई।

शादी के दो साल बाद तारा ने जन्म लिया।

जब उसने पहली बार रोते-रोते सुर जैसा कुछ निकाला, तो दोनों हँस पड़े—

“ये तो अपने दोनों से भी ज्यादा सुर में है।”

उधर राघव के घर में सन्नाटा पसर गया था।

बेटा हर्ष नौकरी के सिलसिले में विदेश चला गया था। कमला ने कई बार कहा,

“कम से कम यह तो पता कर लो कि नंदू कहाँ है, कैसी है… बच्ची हुई होगी तो…”

पर राघव हर बार अख़बार के पीछे छिपकर कह देते,

“जो अपने मन की रानी बनकर चली गई, उसे हमारी ज़रूरत नहीं होगी।”

फिर भी वो रात को चुपके से पुरानी अलमारी खोलते,

उसमें रखी नंदिनी की स्कूल की रिपोर्ट कार्ड, पुरस्कार, फ़ोटो निकालकर देर तक देखते रहते।

एक दिन पुराने पड़ोसी ने बताया,

“आपकी बिटिया कभी-कभी ऑनलाइन गाती है, हमारे बच्चे देखते हैं। बहुत अच्छा गाती है चौधरी साहब।”

राघव ने अनसुना कर दिया।

पर उस रात उन्हें नींद नहीं आई।



साल दर साल बीतते चले गए।

कमला का स्वास्थ्य गिरने लगा।

एक रात तेज़ बुख़ार में उन्होंने राघव का हाथ पकड़कर कहा,

“एक बार नंदू को देखना है… बस एक बार… उससे कह देना, माँ ने कभी उसे बद्दुआ नहीं दी।”

राघव की आँखें भर आईं,

“कहाँ से लाऊँ? मुझे तो पता ही नहीं…”

कमला ने तकिए के नीचे से एक कागज़ निकाला,

“उस दिन जब आप गुस्से में थे, नंदू मुझे ये नंबर दे गई थी… कहा था, ‘जब कभी याद आए, माँ, तो कॉल कर लेना।’

मुझमें हिम्मत नहीं हुई, पर अब तुम कर लो…”

राघव के हाथ काँप गए।

उन्होंने नंबर देखा, कुछ देर तक सोचते रहे, पर कॉल नहीं किया।

कुछ दिनों बाद कमला चली गईं।

उनकी चिता की आग ठंडी होते-होते, राघव के भीतर एक अलग आग लग चुकी थी—

“काश कम से कम मरने से पहले नंदू को दिखा देता उन्हें…”



उधर शहर में नंदिनी अपनी दुनिया में लगी थी।

तारा अब मिडिल स्कूल में थी, आर्यन को कुछ अच्छा काम मिल चुका था।

ज़िंदगी ने उन्हें संघर्षों के बीच छोटे-छोटे सुख देना सीख लिया था।

एक दिन तारा ने पूछा,

“मम्मी, आपके पापा कैसे हैं? नाना जी से कभी मिलवाओगी?”

नंदिनी ने आँखें चुरा लीं,

“वो बहुत सख्त इंसान हैं, बेटा। तुमसे मिलकर शायद पिघल जाएँ, पर हिम्मत ही नहीं जुट पाती उनसे बात करने की।”

तारा ने मासूमियत से कहा,

“जब आप नानी की याद में रोती हो न, तब मुझे लगता है कि कोई आपको भी समझे… शायद नाना जी भी अब अकेले होंगे।”

नंदिनी ने मन-ही-मन तय किया,

“इस बार अदालत के काम से कस्बे जाऊँगी, तो बाबा से ज़रूर मिलूँगी। चाहे जितना डाँट लें, मैं उनके पैर पकड़कर बैठ जाऊँगी।”

पर ज़िंदगी हमेशा हमारे प्लान के हिसाब से नहीं चलती।



एक शाम शहर में बड़ी राजनीतिक रैली थी।

नंदिनी को उसके संगीत समूह के साथ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में बुलाया गया था। मंच के पीछे लगी कमेटी ने उसे विशेष पास और स्टेज के अंदर-बाहर जाने का कार्ड दिया था।

उधर उसी रैली में किसी ने सुना,

“चौधरी साहब, आपकी बेटी भी आज वहीं गा रही होगी शायद। टीवी पर कार्यक्रम आ रहा है।”

राघव ने अनमने मन से टीवी चालू किया।

कुछ ही देर में स्क्रीन पर नंदिनी दिखी—गले में दुपट्टा, हाथ में माइक, आँखों में वही चमक जो बचपन में थी।

गाना खत्म होते ही भीड़ से नारे उठने लगे, माहौल थोड़ा उग्र हो गया। पुलिस की गाड़ियों की साइरन, धक्का-मुक्की, अचानक इधर-उधर भागते लोग…

नंदिनी ने जैसे-तैसे पीछे की गली से निकलने की कोशिश की।

तभी उसने देखा—सड़क के किनारे भगदड़ में एक बूढ़ा आदमी गिर पड़ा था, लोग उसके ऊपर से कूदकर भाग रहे थे। किसी की धज्जी, किसी का जूता, किसी का बैग…

नंदिनी दौड़कर उसके पास पहुँची।

“बाबा जी, उठिए… चोट लगी है क्या?”

बूढ़े ने सिर उठाने की कोशिश की, लेकिन होश जाता रहा।

नंदिनी ने बिना सोचे-समझे उसे घसीटकर एक तरफ किया, दूर से आती जीप को रोकने की कोशिश की।

इसी बीच पीछे से आए कुछ लोग पत्थर फेंक रहे थे, एक पत्थर तेज़ी से आकर सीधे नंदिनी के सिर पर लगा।

दुनिया घूम गई…

वो लड़खड़ाई, फिर भी बूढ़े के ऊपर झुककर उसे बचाने की कोशिश करती रही।

दूसरा पत्थर आया, तीसरा…

किसी ने दोनों को जैसे-तैसे पास के अस्पताल पहुँचाया।

बूढ़ा बच गया।

लेकिन नंदिनी…



वह बूढ़ा और कोई नहीं, राघव ही थे।

इन्होंने टीवी पर कार्यक्रम देखते-देखते खुद ही तय कर लिया था कि आज जाकर एक बार नंदू को दूर से ही देख आएँगे। भीड़ में फँस गए, गिर पड़े, और उन्हें मौत के मुँह से किसी ने खींचकर बाहर निकाला—

उन्हें तब तक पता ही नहीं चला कि वो “कोई” उनकी अपनी ही बेटी थी।

अस्पताल में जब उन्हें होश आया, तो उन्होंने सबसे पहला सवाल यही पूछा,

“जिस लड़की ने मुझे बचाया… वो कैसी है?”

डॉक्टर ने चुप्पी साध ली।

नर्स ने धीरे से कहा,

“वो अब हमारे बीच नहीं हैं, अंकल। आपके सिर में बस हल्की-सी चोट आई थी, पर उन्हें सिर में गंभीर चोट लगी थी। बचाया नहीं जा सका।”

राघव ने बिस्तर का सिरा कसकर पकड़ लिया।

“उसका नाम… उसका नाम क्या था?”

नर्स ने रिपोर्ट देखते हुए कहा,

“आधार कार्ड में नाम लिखा है—नंदिनी आर्यन सिंह।”

दुनिया ठहर गई।

राघव ने महसूस किया—उनके भीतर किसी ने सब कुछ तोड़कर फेंक दिया हो।

वे चिल्लाते हुए उठने की कोशिश करने लगे,

“मेरी नंदू… मेरी नंदू कहाँ है… मुझे ले चलो उसके पास… अभी…”

डॉक्टरों ने उन्हें संभाला, पर राघव की ज़िद के आगे सब हार गए।

कुछ ही देर में वो व्हीलचेयर पर बैठकर उस कमरे में पहुँचे जहाँ सफ़ेद चादर में लिपटी नंदिनी लेटी थी।

और फिर वही दृश्य—

“उठ जा नंदू… देख, तेरे बाबू आ गए हैं… तू कहती थी न कि मैं कभी नहीं बदलूँगा, देख बदल गया हूँ… अब उठा बस…”

तारा और आर्यन दरवाज़े पर खड़े सब देख रहे थे।

आर्यन की आँखों से आँसू झर रहे थे, पर वह कुछ बोल नहीं पा रहा था।

तारा की मुट्ठी में अब भी माँ की साड़ी का कोना दबा हुआ था, जिसे उसने अस्पताल आने से ठीक पहले ही अलमारी से उठाया था।

नर्स ने फिर पूछा,

“सर, कागज़ पर रिश्ते का कॉलम खाली है, लिखना पड़ेगा।”

इस बार राघव के गले की गाँठ जैसे टुट गई।

उन्होंने भर्राई आवाज़ में कहा,

“लिख दो… ‘पिता’… मैं उसका बाप हूँ…”

तारा ने पहली बार अपनी नज़रें उनके चेहरे पर टिका दीं।

“आप… आप मेरे नाना हैं?” उसने धीमे से पूछा।

राघव का दिल फट पड़ा।

उन्होंने कांपते हाथों से उसके सिर पर हाथ रखा,

“हाँ… बहुत देर से सही, पर हाँ… मैं तुम्हारा नाना हूँ, बेटी।”



अगले दिन नंदिनी की अंतिम यात्रा निकली।

राघव ने उसकी अर्थी को कंधा दिया।

शहर के लोगों ने देखा—जो आदमी कभी अपनी बेटी को नाम लेने से भी इनकार करता था, आज वही उसकी तस्वीर सीने से लगाकर रो रहा है।

दाह-संस्कार के बाद वे देर तक गंगा के घाट पर बैठे रहे।

आर्यन चुपचाप पास बैठा था, तारा दादी की पुरानी शॉल ओढ़े बीच-बीच में रो पड़ती।

काफ़ी देर की खामोशी के बाद राघव बोले,

“आर्यन बेटा… मैं जानता हूँ, मैं माफ़ी के लायक नहीं हूँ। मेरी जिद, मेरे अहंकार ने तुम दोनों से कई साल छीन लिए।

मैंने उसे बेटी मानने में इतनी देर कर दी… कि अब वो है ही नहीं सुनने के लिए।

पर अगर तुम दोनों… नहीं…” वे ठिठक गए,

“तुम और तारा चाहो… तो मेरे घर चलो। वो खाली पड़ा है, अब उसमें सिर्फ मैं और नंदू की यादें हैं। कम से कम तारा की हँसी से वो घर फिर जिंदा हो जाएगा।”

आर्यन ने राघव की तरफ़ देखा।

“चौधरी साहब—”

“चौधरी साहब नहीं,” राघव ने बात काट दी,

“अगर मुझे कभी बुलाना हो… तो ‘बाबा’ कहकर बुलाना।

बहुत देर से सही, पर अब मुझे वही सुनना है जिससे मैंने खुद को वंचित रखा।”

आर्यन की आँखों से फिर आँसू बह निकले।

तारा ने धीरे से राघव की तरफ हाथ बढ़ाया,

“नाना… मम्मी के कमरे की अलमारी अब भी वहीं होगी न? उसमें उनके गीतों की डायरी, फोटो… सब रखे होंगे?”

राघव ने सिर हिलाया,

“हाँ बेटी… मैंने आज तक कुछ नहीं फेंका। सोचता था, कभी तो वापस आएगी… मैं दिखाऊँगा, ‘देख, मैंने सब सहेज कर रखा है।’

पर अब शायद मुझे ही तुझे दिखाना होगा।”

तारा ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,

“तो ठीक है नाना, हम चलेंगे आपके घर।

मम्मी की आवाज़ शायद अब गूँजे न गूँजे… उनके गाने मैं गाऊँगी… आप सुनोगे?”

राघव की सूनी आँखों में पहली बार थोड़ा उजाला तैरा।

“हाँ बेटी, अब हर शाम तेरा और नंदू का गाना सुनूँगा।

और जो गलती उससे की,

वो तुझसे नहीं दोहराऊँगा।

तू जो बनेगी, जो करेगी—

तुझे रोकने वाला मैं नहीं होऊँगा।

ज़्यादा से ज़्यादा इतना कहूँगा—‘बेटी, थक गई हो तो कुछ देर आराम कर ले।’”

तारा ने अपना छोटा-सा सिर उनके कंधे पर रख दिया।

आर्यन ने भी चुपचाप सिर झुका लिया।

सूरज डूब रहा था,

गंगा की लहरें लालिमा समेट रही थीं।

एक ज़िद्दी बाप की जिद राख बन चुकी थी,

पर एक नाना का प्यार पहली बार सच में जन्म ले रहा था।

कहीं दूर, जैसे हवा के साथ कोई स्वर तैरता हुआ आया—

वही जो कभी घर के आँगन में गूँजता था।

शायद नंदिनी ही थी,

जो अपने अधूरे रिश्ते का बोझ धरती पर छोड़कर

कहीं हल्की हो गई थी।

लेखिका : आरती कुशवाहा

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