सरकारी दफ्तर की वो पुरानी मेज़ और नया रिश्ता
लखनऊ के पुराने सचिवालय की ऊँची दीवारों और फाइलों के अंबार के बीच केशव और नंदिनी की कहानी शुरू हुई थी। दोनों एक ही विभाग में वरिष्ठ अधिकारी थे। सुबह की चाय से लेकर दोपहर के टिफिन तक, दोनों के बीच बातों का सिलसिला ऐसा बढ़ा कि कब दोस्ती प्यार की दहलीज लांघ गई, पता ही नहीं चला। नंदिनी जितनी सौम्य और सुलझी हुई थी, केशव उतना ही जिम्मेदार और गंभीर।
दोनों की जाति, भाषा और संस्कार एक जैसे थे। बनारसी साड़ी ओढ़ने वाली नंदिनी और माथे पर तिलक लगाने वाले केशव को देखकर कोई भी कह सकता था कि ये जोड़ी तो ऊपर वाले ने फुर्सत में बनाई है। प्यार कोई सोलह बरस का अल्हड़पन नहीं था, बल्कि तीस की उम्र की परिपक्वता थी। केशव ने नंदिनी के परिवार, उसके भाई-बहनों और संस्कारों को अच्छे से परख लिया था। उधर नंदिनी ने भी केशव के घर, उसके माता-पिता और बड़े भाई आलोक और भाभी रेणुका के बारे में पूरी जानकारी जुटा ली थी। उसे विश्वास था कि वह उस घर की तुलसी बन सकती है।
आंगन में उठी विरोध की आंधी
लेकिन कहते हैं न, 'हर अच्छी चीज़ में कोई न कोई ग्रहण ज़रूर लगता है।' जब केशव ने घर पर अपनी माँ सावित्री देवी से विवाह की बात छेड़ी, तो घर का माहौल एकदम बदल गया। शाम का वक्त था, सावित्री देवी आँगन में बैठकर मटर छील रही थीं।
केशव ने डरते-डरते कहा, "माँ, नंदिनी बहुत ही संस्कारी लड़की है। हम दोनों एक-दूसरे को भली-भांति जानते हैं। नौकरीपेशा है, घर भी संभाल लेगी।"
सावित्री देवी ने मटर की फली को जोर से चटकाते हुए कहा, "बेटा, बात संस्कार की नहीं, पहचान की है। शादी दो लोगों का नहीं, दो परिवारों का मेल होता है। न हमने उसके माँ-बाप को देखा, न उसके खानदान को जानते हैं। ऐसे कैसे हम अपनी रजामंदी दे दें? कल को वो हमारे तौर-तरीकों में ढल न पाई तो?"
केशव ने बहुत समझाया, "माँ, ज़माना बदल गया है। मैंने उसे सब बता दिया है कि यहाँ संयुक्त परिवार है, उसे सबके साथ तालमेल बिठाकर चलना होगा। और वो तैयार है। जब उसे कोई आपत्ति नहीं, तो आपको क्या दिक्कत है?"
तभी केशव के पिता, जगदीश बाबू, जो अब तक अख़बार में मुँह छिपाए बैठे थे, ने अपना चश्मा उतारते हुए कहा, "केशव, दुनिया उतनी सीधी नहीं है जितनी तुम्हें दफ्तर की फाइलों में लगती है। आजकल की लड़कियाँ घर जोड़ने नहीं, तोड़ने आती हैं। और वैसे भी... हमें जान-पहचान में ही रिश्ता करना है।"
दहेज की काली छाया और पिता का फरमान
केशव को दाल में कुछ काला नज़र आ रहा था। उसने पिता की आँखों में वो हिचकिचाहट देख ली थी। जगदीश बाबू ने असली बात उगली, "देखो बेटा, साफ़ बात यह है कि मैंने अपने मित्र, शुक्ला जी की बेटी से तुम्हारी बात लगभग पक्की कर दी है। बड़ा घराना है, इकलौती बेटी है और वो लोग शादी में 'खूब मान-सम्मान' (दहेज) देने को तैयार हैं। अब तुम ही सोचो, जानी-पहचान जगह छोड़कर हम अँधेरे में तीर क्यों चलाएं?"
केशव का माथा ठनका। बात संस्कारों की नहीं, बल्कि उस 'मोटे दहेज' की थी, जो उसकी बड़ी भाभी रेणुका अपने साथ लाई थीं। अब पिता जी केशव की शादी में भी वैसी ही उम्मीद लगाए बैठे थे। चूँकि यह प्रेम विवाह था, तो नंदिनी के घर से दहेज की माँग करना मुश्किल था। इसीलिए माता-पिता इस रिश्ते के सख्त खिलाफ थे। केशव को समझ आ गया कि 'भैंस के आगे बीन बजाने' से कोई फायदा नहीं है। वह हताश होकर अपने कमरे में चला गया।
देवर-भाभी की गुप्त मंत्रणा
रात के सन्नाटे में केशव छत पर टहल रहा था। तभी उसकी भाभी रेणुका हाथ में दूध का गिलास लेकर आई। रेणुका घर की बड़ी बहू थी और बहुत समझदार थी।
रेणुका ने धीमे स्वर में कहा, "देवर जी, मैं जानती हूँ आपके दिल पर क्या बीत रही है। बाबूजी और माँ जी का लालच मैं समझती हूँ। पर क्या आप सच में हार मान लेंगे?"
केशव ने झुंझलाकर कहा, "भाभी, मैं क्या करूँ? नंदिनी ने कसम दी है कि वह माँ-बाबूजी के आशीर्वाद के बिना इस घर में कदम नहीं रखेगी। और बाबूजी दहेज के बिना मानेंगे नहीं। मैं फँस गया हूँ।"
रेणुका ने एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा, "तो फिर घी सीधी उंगली से नहीं निकलेगा, उंगली टेढ़ी करनी होगी। नंदिनी को फोन लगाइये, मेरे पास एक योजना है। बस जैसा मैं कहूँ, वैसा ही करना।"
सुबह का अल्टीमेटम: बगावत का नाटक
अगली सुबह घर में कोहराम मच गया। केशव नहा-धोकर तैयार था। उसने माँ से कहा, "माँ, दरवाज़ा बंद कर लो, मैं बाहर जा रहा हूँ।"
माँ ने पूछा, "इतनी सुबह कहाँ?"
केशव ने सपाट आवाज़ में कहा, "कोर्ट (न्यायालय)। आप और बाबूजी तो मानेंगे नहीं, और मैं नंदिनी को धोखा दे नहीं सकता। हमने तय किया है कि हम आज कोर्ट मैरिज कर लेंगे। पहले मंदिर जाएंगे, फिर कोर्ट। पंद्रह दिन बाद हम साथ रहने लगेंगे। आज रात तक घर लौटूंगा, तब तक आप लोग सोच लीजियेगा।"
इतना कहकर केशव तेज़ी से बाहर निकल गया। सावित्री देवी के पैरों तले जमीन खिसक गई। वे दौड़कर जगदीश बाबू के पास गईं, "सुनिए! गज़ब हो गया! आपका लाड़ला कोर्ट मैरिज करने गया है। रोकिये उसे!"
जगदीश बाबू का चेहरा क्रोध और डर से लाल हो गया। उन्होंने केशव को फोन मिलाया, पर फोन नहीं उठा। दिन भर घर में मातम जैसा सन्नाटा छाया रहा। माता-पिता को अब 'दहेज' नहीं, बल्कि 'समाज में कटने वाली नाक' की चिंता सताने लगी।
जेठानी की चाल: 'समाज क्या कहेगा?'
शाम ढलते ही केशव, नंदिनी को लेकर घर आया। दोनों ने आकर जगदीश बाबू और सावित्री देवी के पैर छुए।
केशव ने सिर झुकाकर कहा, "बाबूजी, हमने कोर्ट में अर्जी दे दी है। हमें आपकी दौलत नहीं चाहिए, बस आशीर्वाद चाहिए। अब हम जा रहे हैं।"
उनके जाने के बाद, रेणुका ने अपना पासा फेंका। उसने ससुर जी के पास जाकर दुखी होने का नाटक करते हुए कहा, "बाबूजी, अब तो हद हो गई। दहेज के चक्कर में हाथ से बेटा भी जा रहा है। वे दोनों बालिग़ हैं, कानूनन शादी कर ली तो हम क्या कर लेंगे? उल्टे पूरे मोहल्ले में थू-थू होगी कि जगदीश बाबू के बेटे ने भागकर शादी कर ली। इससे तो अच्छा है..."
जगदीश बाबू ने पूछा, "क्या अच्छा है बहू?"
रेणुका ने बात को हवा दी, "यही कि हम दुनिया को दिखाने के लिए इनकी शादी धूमधाम से कर दें। कम से कम समाज में इज़्ज़त तो रह जाएगी कि शादी हमारी मर्जी से हुई है। बेटा भी घर में रहेगा और बहू भी। और सच कहूँ तो नंदिनी जैसी सुशील लड़की ढूँढने से नहीं मिलेगी।"
समाज के डर और बहू की बातों ने जादू का काम किया। जगदीश बाबू और सावित्री देवी को अपनी गलती का अहसास हुआ, या यूँ कहें कि 'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी' बनकर उन्होंने हाँ कर दी।
विदाई का सच और भाभी का आभार
पंद्रह दिन बाद शहनाइयाँ गूंज उठीं। केशव की बारात सज-धज कर तैयार थी। दूल्हे की गाड़ी पर फूलों के बीच 'केशव संग नंदिनी' लिखा था।
गाड़ी में बैठने से पहले केशव ने अपनी भाभी रेणुका के हाथ जोड़ लिए। उसकी आँखों में कृतज्ञता थी। उसने कहा, "थैंक यू भाभी! अगर आप उस रात वो प्लान न बनातीं और माँ-बाबूजी के मन में 'समाज का डर' न बिठातीं, तो आज यह दिन न आता। नंदिनी ने तो साफ कह दिया था कि वो बिना बड़ों की मर्जी के ब्याह नहीं करेगी। यह सब आपके नाटक का कमाल है।"
रेणुका ने हँसते हुए केशव की नज़र उतारी और कहा, "देवर जी, धन्यवाद मुझे नहीं, अपनी किस्मत को दीजिये। और हाँ, मुझे धन्यवाद देना ही है, तो नंदिनी जैसी प्यारी और समझदार 'देवरानी' लाने के लिए दीजिये, जिससे मेरा घर का काम और बातें दोनों बंट सकेंगी।"
केशव मुस्कुरा दिया। उसे समझ आ गया था कि घर की स्त्रियों में अगर एका हो, तो बड़ी से बड़ी चट्टान भी पिघलाई जा सकती है।
सीख:
