शहर के अहंकार पर भारी पड़ी गाँव की सादगी: स्नेहा को मिली जीवन की सबसे बड़ी सीख

शहर के अहंकार पर भारी पड़ी गाँव की सादगी: स्नेहा को मिली जीवन की सबसे बड़ी सीख

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धूल भरी पगडंडी और शहर का अहंकार

गाड़ी का दरवाजा खुलते ही बाहर की उमस और धूल के बवंडर ने स्नेहा का स्वागत किया। उसने अपने डिज़ाइनर चश्मे को नाक पर टिकाते हुए तुरंत एक सुगंधित टिश्यू निकाला और चेहरे पर रख लिया। सामने की कच्ची सड़क पर गोबर के उपले सूख रहे थे और पास ही एक नाली बह रही थी।

"मम्मा! प्लीज़," स्नेहा ने अपनी माँ, सुमित्रा जी की ओर देखकर झल्लाहट में कहा, "ये है वो जगह जहाँ आप मुझे 'रिलैक्स' करने लाई हैं? यहाँ साँस लेना भी मुश्किल हो रहा है और आप कह रही थीं कि मामा जी का काम बहुत फैल गया है। यहाँ तो सभ्यता का नाम-ओ-निशान नहीं है।"

सुमित्रा जी ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और बेटी को थोड़ी सख्ती से देखा।
"स्नेहा, अपनी आवाज़ नीची रख। गाँव की हवा में शहर जैसा प्रदूषण नहीं है, बस थोड़ी मिट्टी है। और नाक-भौं सिकोड़ना बंद कर, ये तेरे मामा केशव का घर है। रिश्तों में धूल नहीं जमी होनी चाहिए।"

स्नेहा ने बेमन से कंधे उचका दिए। दिल्ली की पॉश कॉलोनी, कॉर्पोरेट ऑफिस की चकाचौंध और वीकेंड पार्टीज़ की आदी स्नेहा के लिए यह गाँव किसी बुरे सपने जैसा था। उसे लगा जैसे वो किसी दूसरी दुनिया में आ गई हो, जहाँ समय थम गया था।

सादगी बनाम दिखावा

दरवाज़े पर पहुँचते ही मामी जानकी दौड़ती हुई आईं। उनके हाथों में आटा लगा था, जिसे वो पल्लू से पोंछ रही थीं।
"अरे मेरी शहर वाली गुड़िया आ गई! आओ-आओ स्नेहा बिटिया, बरसों बाद देखा है तुझे।"

मामी ने उसे गले लगाना चाहा, लेकिन स्नेहा ने बड़ी ही चतुराई से सिर्फ दूर से हाथ जोड़ लिए, जैसे डर हो कि कहीं मामी का स्पर्श उसके ब्रांडेड कपड़ों को मैला न कर दे। मामी की मुस्कान में एक पल के लिए संकोच आया, पर उन्होंने उसे अनदेखा कर दिया।

आँगन में नीम के पेड़ के नीचे एक पुराना तख्त बिछा था। वहीं पास में बोरियों का ढेर लगा था और एक युवक, पसीने से लथपथ, मुनीम जी के साथ कुछ हिसाब-किताब कर रहा था।

"राघव बेटा! देख कौन आया है," मामी ने आवाज़ लगाई।

राघव ने सिर उठाया। सांवला रंग, साधारण सूती कुर्ता-पजामा और चेहरे पर एक विनम्र मुस्कान। वो अपनी चप्पल पहनकर आगे बढ़ा और झुककर सुमित्रा जी के पैर छुए।
"प्रणाम बुआ जी," फिर स्नेहा की ओर मुड़कर बोला, "नमस्ते स्नेहा दीदी! सुना है आप दिल्ली में बहुत बड़ी अफ़सर बन गई हैं।"

स्नेहा ने उसे ऊपर से नीचे तक ऐसे देखा जैसे कोई किसी अजूबे को देख रहा हो। मन ही मन सोचा, 'यही है वो कज़िन जिसकी मम्मा इतनी तारीफ करती हैं? बिलकुल देहाती।'

चाय-नाश्ते के दौरान सुमित्रा जी ने आखिरकार वो बात छेड़ ही दी जिसके लिए वो यहाँ आई थीं।
"भैया, स्नेहा ने अभी-अभी अपना एमबीए पूरा किया है और मार्केटिंग में इसका हाथ बहुत तंग... मतलब तेज़ है," सुमित्रा जी ने बात संभालते हुए कहा। "तुम्हारा गुड़ और मसालों का काम बढ़ रहा है। अगर स्नेहा अपनी मॉडर्न समझ के साथ जुड़ जाए, तो राघव और ये मिलकर इसे बहुत बड़ा ब्रांड बना सकते हैं।"

राघव की आँखों में चमक आ गई। उसने उत्साह से कहा,
"बिल्कुल बुआ जी! मैं तो कब से सोच रहा था कि हमारी पैकेजिंग और ऑनलाइन मार्केटिंग कोई संभाल ले। मुझे तो बस खेत और मंडी की समझ है। अगर दीदी साथ देंगी, तो हम अपने गाँव के मसालों को विदेशों तक पहुँचा सकते हैं।"

स्नेहा ने हाथ में पकड़ा मिट्टी का कुल्हड़ मेज़ पर ज़रा जोर से रख दिया।
"एक्सक्यूज़ मी?" उसने अपनी माँ और राघव को अविश्वास से देखा। "मम्मा, आप होश में तो हैं? मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट बनने की रेस में हूँ, और आप चाहती हैं कि मैं यहाँ... इस धूल-मिट्टी में बैठकर 'राघव मसाले' बेचूँ? ये मेरे स्टैंडर्ड का काम नहीं है।"

पूरे आँगन में सन्नाटा छा गया। मामा जी ने सिर झुका लिया। राघव ने एक गहरी साँस ली और शांत स्वर में बोला,
"दीदी, कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। ये मसाले, ये गुड़... इसी से हमारे घर का चूल्हा जलता है और अब तो पचास और परिवारों का भी जल रहा है।"

"प्लीज़, मुझे लेक्चर मत दो," स्नेहा ने तुनक कर कहा। "तुम अपनी ये गाँव की फिलॉसफी अपने पास रखो। तुम जैसे लोग बस सपने देख सकते हो, उन्हें पूरा करने के लिए 'क्लास' चाहिए होती है, जो यहाँ तो बिलकुल नहीं है।"

स्नेहा वहाँ से उठकर कमरे में चली गई। उस रात उसने अपनी माँ से साफ़ कह दिया, "मैं यहाँ अपना करियर बर्बाद करने नहीं आई हूँ। कल ही हम वापस जा रहे हैं।"

किस्मत का पहिया

वक़्त को पंख लगते देर नहीं लगती। दो साल बीत गए। स्नेहा अपनी कॉर्पोरेट ज़िंदगी की चूहा-दौड़ में ऐसी फँसी कि उसे साँस लेने की फुर्सत न मिली। टार्गेट्स का दबाव और ऑफिस की राजनीति ने उसे अंदर से खोखला कर दिया था।

एक शाम, वो थकी-हारी घर लौटी और सोफे पर गिर गई। टीवी ऑन किया तो एक बिज़नेस न्यूज़ चैनल पर 'स्टार्टअप ऑफ द ईयर' का शो चल रहा था।

एंकर बड़े जोश में बोल रही थी:
"और अब मिलते हैं उस युवा उद्यमी से, जिसने ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल दी है। 'शुद्ध-देसी ऑर्गेनिक्स' के फाउंडर, मिस्टर राघव और उनकी पार्टनर..."

स्नेहा की नींद जैसे उड़ गई। स्क्रीन पर राघव था। वही सांवला रंग, लेकिन अब उस पर एक सधा हुआ खादी का कोट था और चेहरे पर आत्मविश्वास का तेज। वो फर्राटेदार हिंदी और सधी हुई अंग्रेज़ी में जवाब दे रहा था।

"हमें लगा कि हमारे गाँव का स्वाद दुनिया चखनी चाहिए। और इसमें मेरा साथ दिया मेरी पत्नी और बिज़नेस पार्टनर, काव्या ने, जिन्होंने लंदन से मैनेजमेंट की पढ़ाई छोड़कर गाँव को चुना।"

कैमरा काव्या की तरफ घूमा। एक सौम्य, बेहद पढ़ी-लिखी और शालीन महिला, जो राघव के कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी थी। राघव ने मुस्कुराते हुए कहा,
"अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, लेकिन अगर सही साथी मिल जाए, तो वो पहाड़ ज़रूर तोड़ सकता है।"

स्नेहा के हाथ से रिमोट छूट गया। जिसे उसने 'देहाती' और 'अनपढ़' समझा था, वो आज देश का उभरता सितारा बन चुका था। और वो कुर्सी, वो मकाम जो उसका हो सकता था, आज वहाँ कोई और थी। उसे अपने कहे वो शब्द याद आए—"तुम जैसे लोग बस सपने देख सकते हो।" आज राघव ने साबित कर दिया था कि सपने देखने के लिए 'क्लास' की नहीं, 'जज़्बे' की ज़रूरत होती है।

सुमित्रा जी, जो पीछे खड़ी सब देख रही थीं, धीमे स्वर में बोलीं,
"बिटिया, घमंड इंसान को उस ऊँचाई से गिराता है जहाँ संभलने का मौका भी नहीं मिलता। तूने हीरे को पत्थर समझकर ठोकर मार दी थी।"

पश्चाताप और वापसी

छह महीने बाद, स्नेहा फिर उसी गाँव के रास्ते पर थी। लेकिन इस बार, उसने नाक पर रुमाल नहीं रखा था। उसे गोबर की गंध में अब मेहनत की महक आ रही थी।

मामा का घर अब बदल चुका था। पुराने आँगन की जगह एक पक्का ऑफिस बन गया था, जहाँ कंप्यूटरों की कतारें थीं और गाँव की लड़कियाँ यूनिफॉर्म पहनकर काम कर रही थीं। बाहर बोर्ड लगा था—"शुद्ध-देसी ऑर्गेनिक्स प्रा. लि."

स्नेहा झिझकते हुए अंदर दाखिल हुई। राघव अपनी केबिन में बैठा था। उसे देखते ही वो अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया, उसी पुराने आदर के साथ।
"अरे दीदी! आइए, आइए। कैसा आश्चर्य!"

स्नेहा की आँखें भर आईं। उसने देखा कि राघव में ज़रा भी बदलाव नहीं आया था। न तो उसकी चाल में अहंकार था, न ही बातों में तंज़।

"राघव..." स्नेहा का गला रुंध गया, "मुझे माफ़ कर दो। मैं अपनी डिग्री और शहर के घमंड में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे तुम्हारी काबिलियत दिखाई ही नहीं दी। मैं..."

तभी काव्या भी वहाँ आ गई। उसने मुस्कुराकर स्नेहा का हाथ थाम लिया।
"राघव अक्सर आपका ज़िक्र करते हैं, दीदी। वो कहते हैं कि उस दिन आपकी कड़वी बातों ने ही उन्हें जिद्द दी थी कि कुछ बड़ा करके दिखाना है।"

राघव हँसा। "छोड़िए वो पुरानी बातें दीदी। 'सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए, तो उसे भूला नहीं कहते'। काव्या और मैं सोच रहे थे कि हमें दिल्ली के डिस्ट्रीब्यूशन के लिए किसी भरोसेमंद इंसान की ज़रूरत है। कोई ऐसा जो परिवार का भी हो और जिसे बाज़ार की समझ भी हो।"

स्नेहा अवाक रह गई। "तुम... तुम अब भी मुझे अपने साथ काम करने का मौका दोगे? मेरे इतने अपमान के बाद भी?"

राघव ने मेज़ पर रखे गुड़ की एक डली स्नेहा की ओर बढ़ाई और बोला,
"दीदी, हम किसान लोग हैं। हम फसल काटते हैं, जड़ें नहीं काटते। रिश्ते और व्यापार में बस नीयत साफ़ होनी चाहिए। अगर आप तैयार हैं, तो ये पार्टनरशिप आज से पक्की?"

स्नेहा के गालों पर आँसू लुढ़क आए, लेकिन इस बार ये आँसू पछतावे के नहीं, बल्कि कृतज्ञता के थे। उसने कांपते हाथों से वो गुड़ का टुकड़ा उठाया। उसे एहसास हुआ कि जो मिठास अपनों के साथ और अपनी मिट्टी में है, वो किसी मल्टीनेशनल कंपनी के एयर-कंडीशन्ड कमरे में नहीं।

उसने सीख लिया था कि इंसान की पहचान उसके जूतों या अंग्रेजी से नहीं, बल्कि उसके विचारों और संस्कारों से होती है।

सीख: कभी भी किसी को उसके वर्तमान हालात या साधारण वेशभूषा से कम नहीं आंकना चाहिए। समय और मेहनत राजा को रंक और रंक को राजा बना सकते हैं। असली तरक्की अपनों को साथ लेकर चलने में है, उन्हें नीचा दिखाने में नहीं।

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