माटी की सौंधी महक और यादों का घाट
गाँव आए हुए मुझे पंद्रह दिन बीत चुके थे और अब वापसी में मात्र पाँच दिन शेष थे। जब से सात समंदर पार अपनी नौकरी पर वापस जाने की टिकट करवाई है, मन में एक अजीब सी बेचैनी है। पाँच साल... कहने को तो सिर्फ़ पाँच साल थे, लेकिन समय की आंधी ने सब कुछ बदल दिया था। गाँव के पुराने दोस्तों की टोली, जो कभी इस पीपल के पेड़ के नीचे और नदी के घाट पर जमती थी, अब तिनके की तरह बिखर चुकी थी।
हर शाम, जब मंदिर की घंटियाँ बजने लगती हैं, मैं इस पुरानी पक्की सीढ़ियों पर आकर बैठ जाता हूँ। लहरों को निहारते हुए मुझे वो पुराने दिन याद आते हैं। वो हमउम्र दोस्तों का हुजूम... वो कंजूस दीनानाथ जो कभी समोसे के पैसे नहीं देता था, वो सुबह-सुबह अखाड़े में दंड पेलने वाला पहलवान रघु, और शेरो-शायरी में डूबा रहने वाला उदास सा किशन। लेकिन, इन सब चेहरों के बीच एक चेहरा ऐसा था जिस पर आकर मेरी सारी सोच, सारी दुनिया थम जाती थी।
वो थी लज्जो... यानी लाजवंती। नाम लाजवंती था, लेकिन शर्म-ओ-हया से उसका दूर-दूर तक वास्ता नहीं था। वो गाँव की सबसे अल्हड़, सबसे मुँहफट और सबसे ज़िंदादिल लड़की थी।
वो पुरानी अल्हड़ लज्जो
लज्जो हम सबसे अलग थी। जहाँ गाँव की लड़कियाँ घूँघट और रीतियों में सिमटी रहती थीं, लज्जो को खुले आसमान में पतंग की तरह उड़ना पसंद था। उसे चूल्हा-चौका फूँकने से सख्त नफरत थी। वो अक्सर इमली के पेड़ पर चढ़कर कैरियां तोड़ती और कहती, "अरे ओ माधो! ये ज़िंदगी चार दिन की है, इसे घुट-घुट के नहीं, खुल के जीना चाहिए। मैं किसी खूंटे से बंधने वाली गाय नहीं हूँ, मैं तो वो हिरणी हूँ जो कुलांचे भरेगी।"
गाँव वाले कहते, "हाथ से निकल गई है छोरी," लेकिन मेरा दिल उसी की बेबाकी पर हार बैठा था। मैं घंटों उसे निहारता रहता। उसकी खिलखिलाती हँसी जैसे मंदिर की घंटी हो, और उसकी वो बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें... मैं बस उन्हीं में डूबना चाहता था। हम दोनों का स्वभाव बिलकुल विपरीत था। मैं गंभीर, शांत और वो... तूफ़ान का दूसरा नाम।
मुझे याद है वो शाम, जब होली के मेले में मैंने भीड़ से बचाकर उसे एक कोने में रोका था। मेरे दिल की धड़कनें ढोल से तेज़ थीं। मैंने कांपती आवाज़ में कहा था, "लज्जो... सुन। मुझे तू बहुत अच्छी लगती है। क्या मेरे साथ...?"
उसने अपनी ओढ़नी संभाली और जोर से हँस पड़ी, "अरे जा रे बुद्धू! अभी तो मैंने उड़ना शुरू किया है। ये प्यार-व्यार और घर-गृहस्थी का पिंजरा मुझे नहीं चाहिए। मुझे तो अभी पूरी दुनिया देखनी है, अपनी मर्ज़ी की मलिका बनना है।"
फिर उसने मज़ाक में कहा था, "तू बड़ा सीरियस रहता है रे माधो, बिल्कुल देवदास की तरह। थोड़ी मस्ती किया कर।" और वो सहेलियों के साथ भाग गई थी। उसके बाद मैं पढ़ाई के लिए विदेश चला गया और लज्जो... लज्जो अपनी दुनिया में गुम हो गई। न मैंने पीछे मुड़कर देखा, न उसने कभी ख़त लिखा।
वक़्त की मार और धुंधला अतीत
आज शाम के चार बजे थे। नदी के पानी में डूबते सूरज की लालिमा घुल रही थी। मैं अपनी सोच में गुम था कि तभी पीछे से किसी के कदमों की आहट सुनाई दी। कोई मेरे पास आकर चुपचाप खड़ा हो गया।
मैंने मुड़कर देखा तो मेरी आँखों को विश्वास नहीं हुआ। "लज्जो? तुम?"
लेकिन यह वो लज्जो नहीं थी। वो चहकता हुआ चेहरा अब मुरझाया हुआ था, जैसे पानी बिना तुलसी का पौधा सूख गया हो। आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे और माँग सूनी थी। चेहरे पर एक ऐसी वीरानी छायी थी जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था। वो बिना कुछ बोले मेरे पास सीढ़ी पर बैठ गई।
मैंने सकुचाते हुए पूछा, "कहाँ थी तुम इतने साल? मैं कब से पुरानी टोली को ढूँढ रहा हूँ। रघु, किशन, दीना... सब कहाँ गए? और तुम... तुम इतनी शांत क्यों हो? तुम्हारी वो खिलखिलाती हँसी कहाँ गई?"
उसने एक ठंडी आह भरी, ऐसी आह जो कलेजे को चीर दे। बोली, "अभी कुछ मत पूछ माधो... बस थोड़ी देर मुझे अपनी चुप्पी में बैठने दे। बहुत थक गई हूँ मैं। दुनिया के शोर से, अपनों के ताानों से... बस थोड़ी देर यहाँ शांति चाहिए।"
मैं सिहर गया। "तुम कितनी बदल गई हो लज्जो। सब ठीक तो है न?"
वो फीका सा मुस्कुराई, "ठीक? हाँ, सब ठीक ही तो है। बस अकेली हूँ। भरी दुनिया में नितांत अकेली।"
"अरे! वो लड़की कहाँ गई जो कहती थी कि मैं पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में कर लूँगी?"
"ताने मार रहा है न?" उसकी आवाज़ भर्रा गई। "कल तक मुझे लगता था कि अपनी मर्ज़ी से जीना ही आज़ादी है। मैंने माँ-बाप की मर्जी के खिलाफ जाकर अपनी पसंद से शादी की... शहर गई... लगा कि आसमान मिल गया। लेकिन सब झूठ था माधो। सब छलावा था।"
टूटे सपनों की करुण कथा
उसकी आँखों से आँसू टपक कर उसके सादे दुपट्टे पर गिर रहे थे। मैं उसे चुप कराने के लिए अपना हाथ बढ़ाना चाहता था, पर रुक गया।
उसने सिसकते हुए कहा, "जिसे मैं प्यार समझती थी, वो सिर्फ़ एक सौदा था। पहले दहेज के लिए ताने, फिर मारपीट... और जब मैं माँ बनने वाली थी, तो मेरे पति ने नशे में मुझे सीढ़ियों से धक्का दे दिया। मेरा बच्चा... मेरा बच्चा दुनिया में आने से पहले ही मर गया माधो। और वो आज़ाद ख्यालों वाली लज्जो, उस दिन उसी घर की चारदीवारी में दफ़न हो गई।"
मैं सन्न रह गया। वो आगे बोलती रही, "पिताजी ये सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाए और चल बसे। माँ भी उनके पीछे चली गई। मायके के दरवाजे बंद हो गए, और ससुराल... वो तो नर्क था ही। मैंने सोचा कि अपनी जान दे दूँ..."
उसने अपनी कलाई आगे की। वहाँ एक गहरा ज़ख्म था, जिस पर अब पपड़ी जम चुकी थी।
"आत्महत्या? लज्जो तुम? तुम तो इतनी बहादुर थी?" मेरा गला रुंध गया।
"बहादुरी? जब इंसान की आत्मा मर जाए, तो शरीर को मारने में क्या बहादुरी और क्या कायरता? मैं तो ज़िंदा लाश हूँ।"
एक नई शुरुआत
उसकी बातें सुनकर मेरा दिल जैसे मुट्ठी में भींच गया हो। मुझे वो पुरानी लज्जो याद आई, और फिर सामने बैठी ये हारी हुई औरत। लेकिन न जाने क्यों, आज मुझे उस पर पहले से भी ज़्यादा प्यार आ रहा था। उसकी पीड़ा ने मेरे सोए हुए जज़्बातों को फिर से जगा दिया था।
मैंने हिम्मत करके उसका हाथ अपने हाथों में थाम लिया। वो चौंकी, पर उसने हाथ खींचा नहीं।
मैंने कहा, "लज्जो, चलो यहाँ से। मेरे साथ।"
उसने प्रश्नवाचक नज़रों से मुझे देखा।
"मैं तुम्हें विदेश ले चलूँगा। वहाँ कोई तुम्हें तुम्हारे अतीत से नहीं पहचानेगा। तुम फिर से जीना सीखोगी। मैं तुम्हें वो खुला आसमान दूँगा जिसकी तुम हक़दार हो। मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा... कभी नहीं। क्या चलोगी मेरे साथ?"
उसकी आँखों में वर्षों बाद उम्मीद की एक हल्की सी किरण दिखाई दी। उसने रोते हुए अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। जैसे एक भटकती हुई नाव को आख़िरकार किनारा मिल गया हो।
उस दिन घाट की सीढ़ियों पर, डूबते सूरज की गवाही में, हमने बिना सात फेरे लिए एक-दूसरे का साथ निभाने का वचन ले लिया था। वो जान गई थी कि जो सिर्फ़ अच्छे वक़्त में साथ दे, वो आकर्षण है, लेकिन जो टूटने के बाद भी आपको समेट ले... वही सच्चा प्रेम है।
सीख: सच्चा प्रेम शारीरिक सुंदरता या सुख के पलों का मोहताज नहीं होता। प्रेम का असली अर्थ है - किसी के दुःख को अपनाना और जब पूरी दुनिया साथ छोड़ दे, तब उसका हाथ थाम लेना।
