सुख की छाँव और बुढ़ापे का सहारा
बनारस के घाटों के पास एक पुराना लेकिन बेहद सुंदर मकान था, जिसे इलाके के लोग 'माधव विला' के नाम से जानते थे। इस घर में माधव बाबू और उनकी धर्मपत्नी कौशल्या देवी रहते थे। माधव बाबू रेलवे से बड़े पद से रिटायर हुए थे, और कौशल्या देवी एक आदर्श भारतीय गृहिणी थीं, जिनके दिन की शुरुआत तुलसी-चौरे पर जल चढ़ाने और रामायण के पाठ से होती थी। उनका एक ही बेटा था, आलोक, जो उनकी आँखों का तारा था। आलोक डॉक्टरी की पढ़ाई करने लंदन गया हुआ था।
घर बड़ा था, पर खालीपन उससे भी बड़ा था। माधव बाबू सुबह गंगा किनारे टहलने निकल जाते और कौशल्या देवी घर के पेड़-पौधों को अपनी संतानों की तरह सहेजतीं। दोनों अक्सर शाम की चाय के साथ बरामदे में बैठते और बस यही बातें करते कि कब आलोक लौटेगा और कब यह घर किलकारियों से गूंजेगा। कौशल्या जी अक्सर कहतीं, "माधव जी, जैसे सूखी नदी को पानी की आस होती है, वैसे ही इन बूढ़ी आँखों को अब बस आलोक के सेहरे की आस है।"
नई पीढ़ी का आगमन और खुशियों की दस्तक
समय का पहिया घूमा और आलोक अपनी पढ़ाई पूरी कर स्वदेश लौट आया। उसने अपने माता-पिता के चरणों में झुककर आशीर्वाद लिया और अपना सपना बताया—वह अपने ही शहर में, अपने माता-पिता के नाम पर एक नर्सिंग होम खोलना चाहता था। माधव बाबू और कौशल्या देवी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। 'माधव-कौशल्या सेवा सदन' की नींव रखी गई।
घर को अब एक गृहलक्ष्मी की भी ज़रूरत थी। जल्द ही कौशल्या देवी ने आलोक के लिए एक सुयोग्य वधू ढूँढ़ ली। उसका नाम था नित्या
विचारों का टकराव और पीतल के बर्तन
शुरुआत में सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। नित्या सुबह अस्पताल जाती और शाम को घर लौटती। वह बड़ों का सम्मान करती थी, लेकिन उसकी जीवनशैली और सोचने का तरीका कौशल्या देवी से बिलकुल अलग था। कौशल्या देवी चाहती थीं कि बहू घर के रीत-रिवाजों को, अचार-पापड़ बनाने की परंपराओं को वैसे ही निभाए जैसे वो निभाती आई हैं। पर नित्या के पास समय की कमी थी और वह 'शॉर्टकट' और आधुनिकता में विश्वास रखती थी।
एक बार कौशल्या देवी को अपनी बहन के घर किसी शादी में दूसरे शहर जाना पड़ा। वे एक हफ्ते के लिए बाहर थीं। पीछे से नित्या ने सोचा कि रसोईघर बहुत पुराना हो गया है और काम करने में असुविधा होती है। उसने रसोई का पूरा कायाकल्प कर दिया। कौशल्या देवी के सहेजे हुए भारी-भरकम पीतल और तांबे के बर्तन, जिन्हें वे घंटों रगड़कर सोने सा चमकाती थीं, उन्हें हटाकर स्टोर रूम में रखवा दिया गया। उनकी जगह ले ली कांच के फैंसी सेट और नॉन-स्टिक बर्तनों ने।
अनकहा दर्द और दूरियाँ
जब कौशल्या देवी वापस लौटीं और रसोई में कदम रखा, तो वे सन्न रह गईं। उनकी रसोई, जो उनका साम्राज्य थी, अब किसी होटल की पैंट्री जैसी लग रही थी। उन्होंने भारी मन से नित्या से पूछा, "बहू, मेरे पीतल के बर्तन कहाँ गए? उनमें खाना पकाने का स्वाद ही कुछ और था, यह कांच के टुकड़े यहाँ क्यों सजा दिए?"
नित्या ने सहज भाव से कहा, "माँ जी, वो बर्तन बहुत भारी थे और उन्हें मांजना भी मुश्किल था। यह बोन-चाइना और स्टील के बर्तन साफ़ करने में आसान हैं और देखने में भी मॉडर्न लगते हैं। अब ज़माना बदल गया है, हमें भी बदलना चाहिए।"
कौशल्या देवी को यह बात शूल की तरह चुभी। उन्होंने उम्मीद भरी नज़रों से आलोक की तरफ देखा, सोचा बेटा माँ के जज़्बातों को समझेगा। पर आलोक ने भी पत्नी का पक्ष लेते हुए कहा, "माँ, नित्या सही तो कह रही है। आप क्यों पुरानी लकीर की फकीर बनी रहती हैं? जो सुविधा दे, वही अपनाना चाहिए।"
कौशल्या देवी चुप हो गईं। वे समझ गईं कि अब इस घर में उनकी पसंद-नापसंद 'आउटडेटेड' हो चुकी है। बेटे का यह रवैया उन्हें भीतर तक तोड़ गया। "अपना ही सिक्का खोटा हो, तो परखने वाले को क्या दोष दें?" वे मन मसोस कर रह गईं। धीरे-धीरे उन्होंने घर के फैसलों में बोलना छोड़ दिया। छोटी-छोटी बातों पर बहस करने के बजाय उन्होंने चुप्पी साध ली, जो किसी भी रिश्ते के लिए ज़हर समान होती है।
रिश्तों की परीक्षा
अंदर ही अंदर घुटते हुए कौशल्या देवी बीमार रहने लगीं। उनकी चुप्पी उनके स्वास्थ्य को दीमक की तरह चाट रही थी। एक रात उनकी तबीयत बहुत बिगड़ गई। आलोक और नित्या घबरा गए। आलोक ने तुरंत एंबुलेंस बुलाई और कहा, "माँ, हम अभी अपने नर्सिंग होम चलते हैं, वहाँ सारी सुविधाएं हैं।"
बुखार में तपती कौशल्या देवी ने कांपते हुए हाथ से आलोक का हाथ झटक दिया और भर्राई आवाज़ में बोलीं, "नहीं! मुझे तुम्हारे अस्पताल नहीं जाना। मुझे किसी भी दूसरे सरकारी अस्पताल ले चलो, पर वहाँ नहीं।"
यह सुनकर आलोक और नित्या के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। आलोक की आँखों में आँसू आ गए, "माँ, यह आप क्या कह रही हैं? मुझसे ऐसी क्या गलती हो गई?"
तब माधव बाबू, जो अब तक खामोश तमाशाई बने हुए थे, आगे आए। उन्होंने अपनी पत्नी के सिर पर हाथ फेरा और बच्चों की ओर देखकर कड़े स्वर में बोले, "तुम्हें हैरानी हो रही है? गौर नहीं किया तुमने? तुम्हारी माँ पिछले कई महीनों से इस घर में खुद को एक फालतू सामान समझ रही है। तुमने घर तो मॉडर्न बना लिया, पर उस मॉडर्न घर में इसकी भावनाओं के लिए कोई कोना नहीं छोड़ा। जब उसने अपने दिल की बात कहनी चाही, तो तुम दोनों ने उसे 'पुराने ज़माने की सोच' कहकर खारिज कर दिया। यह बीमारी शरीर की नहीं, मन के अकेलेपन की है।"
पश्चाताप और मिलन
माधव बाबू की बातें सुनकर नित्या की आँखों से पर्दा हट गया। उसे एहसास हुआ कि उसने सुविधा के नाम पर अपनी सासू माँ की भावनाओं का गला घोंट दिया था। वह दौड़कर कौशल्या देवी के पैरों के पास बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी।
"माँ जी, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मैं डॉक्टर होकर भी आपका दिल नहीं पढ़ पाई। मैंने सिर्फ सुविधा देखी, आपका स्नेह नहीं। वो पीतल के बर्तन सिर्फ बर्तन नहीं थे, वो आपकी गृहस्थी की जमा-पूंजी थे। मुझे माफ़ कर दीजिए माँ जी। आप जो कहेंगी, जैसा कहेंगी, वैसा ही होगा। मैं आपकी बहू नहीं, बेटी बनकर रहना चाहती हूँ।"
आलोक भी माँ के गले लग गया, "माँ, मैं अपनी होशियारी में यह भूल गया कि पेड़ कितना भी बड़ा हो जाए, रहता जड़ों के सहारे ही है। मुझे माफ़ कर दो।"
बच्चों की आँखों में सच्चा पश्चाताप देखकर कौशल्या देवी का मातृ-हृदय पिघल गया। उन्होंने दोनों को गले से लगा लिया। उस दिन घर की दीवारों ने सिर्फ मॉडर्न पेंट नहीं, बल्कि रिश्तों की पुरानी गर्माहट भी महसूस की। रसोई में अब स्टील के बर्तनों के साथ-साथ पीतल की कड़ाही भी वापस आ गई थी, जिसमें कौशल्या देवी और नित्या मिलकर खीर बनाती थीं।
सीख: घर ईंट-पत्थर से नहीं, भावनाओं से बनता है। दो पीढ़ियों के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन संवादहीनता रिश्तों को खत्म कर देती है। बड़ों को अपने अनुभव और छोटों को अपने नए विचारों का सामंजस्य बिठाना चाहिए, तभी घर 'घर' रहता है।
