सुलगते सवाल और आंसुओं का सैलाब
बनारस के घाट के पास वाले अपने पुश्तैनी घर की छत पर खड़ी वंदना की आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। गंगा की ठंडी हवा भी उसके मन की तपन को कम नहीं कर पा रही थी। उसने कांपते हाथों से अपनी माँ, सविता जी को वीडियो कॉल लगाया।
"माँ... अब मुझसे और नहीं सहा जाता," वंदना ने सुबकते हुए कहा, उसका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था।
सविता जी, जो उस समय अपने आँगन में तुलसी में जल चढ़ा रही थीं, घबरा गईं। "क्या हुआ वंदना? तू रो क्यों रही है? सब ठीक तो है?"
"कुछ ठीक नहीं है माँ," वंदना ने रुंधे गले से शिकायत की। "आज फिर राकेश सुबह-सुबह महाभारत करके दफ्तर गए हैं। रोज का यही ड्रामा हो गया है। छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनाना कोई उनसे सीखे। मेरा तो पूरा दिन खराब हो गया, मैंने ऑफिस से छुट्टी ले ली और सर पकड़कर बैठी हूँ। समझ नहीं आता, खुद तो चिल्लाकर चले जाते हैं और मैं यहाँ दिन भर घुटती रहती हूँ।"
सविता जी ने गहरी साँस ली और तसल्ली से पूछा, "बेटा, ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। आखिर बात क्या हुई थी? पिछले दस दिनों में यह तुम्हारा तीसरा फोन है। मुझे तो लगता था राकेश बहुत ही सुलझा हुआ दामाद है। तुम ऐसा करो, अगर मन ज्यादा भारी है तो दो-चार दिन के लिए यहाँ मायके आ जाओ। यहीं से अपना 'वर्क फ्रॉम होम' कर लेना।"
वंदना ने झट से कहा, "हाँ माँ, मैं शाम तक का भी इंतज़ार नहीं कर सकती। मैं अभी निकल रही हूँ। राकेश से पूछने की मुझे कोई ज़रूरत नहीं है, वैसे भी मेरा उनसे बात करने का मन नहीं है।"
सविता जी ने उसे रोका, "ना बेटा, ऐसी गलती मत करना। 'क्रोध में बुद्धि हर ली जाती है।' अगर तुम बिना बताए या बिना पूछे आओगी, तो यह आग में घी डालने जैसा होगा। घर जोड़ना है तो थोड़ा झुकना पड़ता है। उन्हें फोन करो, बताओ और इज़ाज़त लेकर आओ।"
वंदना ने अनमने ढंग से हामी भरी, "ठीक है माँ, बता दूंगी, पर पूछूँगी नहीं।" वंदना एक बड़ी आईटी कंपनी में ऊँचे ओहदे पर थी, अपनी काबिलियत पर उसे नाज़ था, जो कभी-कभी अनजाने में अहंकार का रूप ले लेता था। उसने राकेश को रूखा सा मैसेज किया और मायके रवाना हो गई।
चांदनी रात और कड़वे सच
शाम ढल चुकी थी। वंदना अपने मायके के खुले दालान में बैठी थी। पिता जी भोजन करके सोने चले गए थे। रात की रानी की खुशबू हवा में घुली थी, लेकिन वंदना के मन में कड़वाहट अभी भी थी। सविता जी ने अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, "अब बता, उस दिन असल में हुआ क्या था? और उससे पहले भी क्या खटपट चल रही थी?"
वंदना का बाँध टूट पड़ा। "माँ, परसों राकेश ने अपने कुछ दोस्तों को खाने पर बुलाया था। मैंने ऑफिस से जल्दी आकर बड़ी मेहनत से 'शाही पनीर' और पुलाव बनाया। लेकिन खाना खाते ही राकेश ने सबके सामने टोक दिया—'अरे, इसमें तो नमक कम है, और पनीर भी थोड़ा सख्त रह गया।' माँ, मुझे इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई। मैंने इतनी मेहनत की और उन्होंने सरेआम मेरी फजीहत कर दी। फिर भी मैं चुप रही।"
वंदना ने आँसू पोंछते हुए आगे कहा, "दोस्तों के जाने के बाद मैंने उनसे कहा भी कि आपको सबके सामने ऐसा नहीं कहना चाहिए था, लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा। उन्होंने कहा मैं सच ही तो बोल रहा था।"
सविता जी चुपचाप सुनती रहीं।
"और हद तो कल हो गई माँ," वंदना का स्वर ऊँचा हो गया। "कल उनके बॉस डिनर पर आए थे। राकेश हमेशा मेरे खाने में मीन-मेख निकालते हैं, इसलिए मैंने बाहर से खाना मंगवा लिया। बातों-बातों में उनके बॉस ने मुझसे मेरी कंपनी और पोस्ट के बारे में पूछा। जब मैंने बताया, तो वो हैरान रह गए। बोले—'अरे वाह! आपकी कंपनी तो हमारे टर्नओवर से कहीं आगे है, आपकी सैलरी तो यकीनन बहुत शानदार होगी।'
वंदना ने एक पल रुककर कहा, "मैंने बस इतना ही कहा— 'जी सर, बहुत ज्यादा तो नहीं, लेकिन हाँ, राकेश के पैकेज से तो काफी ज्यादा है।' बस माँ, इसी बात को लेकर आज सुबह उन्होंने क्लेश शुरू कर दिया। क्या सच बोलना गुनाह है?"
अहंकार और समझदारी की सीख
सविता जी अब पूरी बात समझ चुकी थीं। उन्होंने वंदना का हाथ अपने हाथ में लिया और स्नेह से समझाया, "बेटी, तुम बहुत पढ़ी-लिखी हो, समझदार हो, पर यहाँ तुम मात खा गई। तुमने अनजाने में ही सही, पर राकेश के पुरुष अहं (Male Ego) को चोट पहुँचाई है।"
"लेकिन माँ..." वंदना ने प्रतिवाद करना चाहा।
"मेरी बात पूरी सुन," सविता जी ने टोकते हुए कहा। "समाज बदल गया है, पर कुछ भावनाएँ नहीं बदलतीं। कोई भी पति, चाहे वह कितना भी आधुनिक क्यों न हो, यह बर्दाश्त नहीं कर पाता कि दुनिया के सामने, और खास तौर पर उसके बॉस के सामने, उसे अपनी पत्नी से 'कम' आंका जाए। जब तुमने सैलरी की तुलना की, तो उसे लगा कि तुम उसे नीचा दिखा रही हो। रही बात खाने की, तो हम राकेश को समझाएंगे कि 'घर की बात घर में रहे' तो अच्छा है, सबके सामने नुक्स नहीं निकालने चाहिए। लेकिन तुम्हें भी समझना होगा कि शब्द तीर की तरह होते हैं, कमान से निकल गए तो वापस नहीं आते।"
वंदना ने झुंझलाकर कहा, "तो क्या मेरी सैलरी ज्यादा है तो मैं अपराधबोध में जियूँ? क्या मुझे अपनी सफलता पर गर्व नहीं होना चाहिए?"
माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, "गर्व करो, अहंकार नहीं। गृहस्थी की गाड़ी दो पहियों पर चलती है, अगर एक पहिया बड़ा है तो गाड़ी का संतुलन बनाने के लिए उसे थोड़ा झुककर चलना पड़ता है, नहीं तो गाड़ी पलट जाती है। राकेश के बॉस को पहले ही अंदाज़ा था, तुम्हें मुँह से बोलकर तुलना करने की ज़रूरत नहीं थी। रिश्तों में 'मैं' और 'तुम' से बड़ा 'हम' होता है।"
नयी सुबह, नयी शुरुआत
अगले दिन सविता जी और वंदना के पिता ने राकेश को चाय पर बुलाया। माहौल थोड़ा तनावपूर्ण था, लेकिन बड़ों की मौजूदगी ने उसे संभाल लिया।
वंदना के पिता ने राकेश के कंधे पर हाथ रखकर कहा, "बेटा, वंदना ने पढ़ाई में बहुत समय दिया है, इसलिए उसे रसोई का उतना तजुर्बा नहीं है जितना मेरी पत्नी को है। अगर वह तुम्हारे लिए प्रेम से कुछ बनाती है, तो उसमें नमक की जगह उसके प्रयास का स्वाद देखो। उसे हतोत्साहित मत करो।"
दूसरी तरफ, वंदना ने भी अपनी गलती महसूस की। जब दोनों अकेले हुए, तो वंदना ने धीरे से कहा, "राकेश, मुझे बॉस के सामने वो बात नहीं कहनी चाहिए थी। मेरा इरादा आपको दुख पहुँचाना नहीं था। आई एम सॉरी।"
राकेश का गुस्सा भी पिघल चुका था। उसने वंदना का हाथ थामते हुए कहा, "गलती मेरी भी थी वंदना। मुझे दोस्तों के सामने तुम्हारे खाने की बुराई नहीं करनी चाहिए थी। मुझे तुम पर गर्व है, बस उस समय मुझे लगा कि मेरी अहमियत कम हो गई है।"
दोनों की आँखों में समझदारी की चमक थी। बड़ों की सूझबूझ ने एक घर को टूटने से बचा लिया था। वंदना समझ गई थी कि ऑफिस की फाइलों और घर के रिश्तों को संभालने के नियम अलग-अलग होते हैं।
सीख: गृहस्थी में पति-पत्नी एक-दूसरे के पूरक होते हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं। जहाँ एक का सम्मान घटता है, वहाँ दूसरे की जीत नहीं, बल्कि रिश्ते की हार होती है। थोड़ी सी समझदारी और मीठी वाणी बड़े से बड़े कलह को मिटा सकती है।
