मां की सीख और रिश्तों की डोर- प्रेमचंद कुमार

मां की सीख और रिश्तों की डोर- प्रेमचंद कुमार

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पढ़ने का समय

मीरा अपने मुंबई के फ्लैट की बालकनी में खड़ी होकर शाम की चाय पी रही थी, तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर 'मां' का नाम चमकते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। पुणे में बैठी उसकी मां, लता जी, हर शाम उसे दुनियादारी का पाठ पढ़ाना नहीं भूलती थीं।

"मीरा, दीवाली आ रही है। तू इस बार भी ससुराल जाने की तैयारी कर रही है क्या?" लता जी ने कड़े स्वर में पूछा।

"हाँ मां, विक्रम कह रहे थे कि उदयपुर जाना चाहिए। शादी के बाद यह पहली बड़ी दीवाली है, तो बाबूजी और अम्माजी उम्मीद लगाए बैठे होंगे," मीरा ने झिझकते हुए जवाब दिया।

उधर से लता जी की तीखी हंसी सुनाई दी। "अरे पगली! ससुराल वाले तो बस दिखावे के अपने होते हैं। तू वहां जाकर क्या करेगी? दिन भर रसोई में खटती रहेगी। उनकी अपनी बेटी, रश्मि, तो आ ही रही होगी। तू मेरी मान, पुणे आजा। यहां हम सब मिलकर जश्न मनाएंगे। याद रख, सास-ससुर को चाहे जितना पूज लो, वो कभी मां-बाप की जगह नहीं ले सकते।"

मां की बातों का मीरा पर गहरा असर हुआ। शाम को जब विक्रम ऑफिस से घर लौटा, तो उसके हाथ में उदयपुर की ट्रेन की टिकट्स थीं।

पहली कलह और मायके का मोह

"मीरा, देखो! मैंने दीवाली की बुकिंग करवा ली है। अम्मा ने फोन किया था, वो तुम्हारे लिए बेसन के लड्डू अभी से बना रही हैं," विक्रम ने उत्साह से कहा।

मीरा ने मुंह फेर लिया और रूखेपन से बोली, "विक्रम, मेरा मन पुणे जाने का है। आपकी बहन रश्मि तो उदयपुर आ ही रही है, फिर मेरी क्या ज़रूरत? मुझे अपनी पहली दीवाली अपने घर, यानी मायके में मनानी है।"

विक्रम का चेहरा उतर गया। उसने समझाने की कोशिश की, "मीरा, रश्मि दीदी के पति का देहांत हुए दो साल हो गए हैं। वो वहां अकेलेपन से बचने आती हैं। हम घर के बेटे-बहू हैं, हमारा वहां होना अम्मा-बाबूजी के लिए खुशी की बात होगी। तुम अपनी तुलना दीदी से क्यों कर रही हो?"

लेकिन मीरा पर तो मां की नसीहतों का भूत सवार था। अंततः, नई गृहस्थी में कलेश न हो, इसलिए विक्रम को हार माननी पड़ी और वे दोनों पुणे चले गए। मीरा की 'जीत' हो गई, लेकिन विक्रम के माता-पिता की आंखों में वो सूनापन रह गया, जिसे उन्होंने फोन पर हंसी के पीछे छुपा लिया।

फासलों की दीवार

वक्त बीतता गया। मीरा जब भी मायके से लौटती, लता जी उसके दिमाग में शक और स्वार्थ के नए बीज बो देतीं। "ससुराल वाले तो बहू को कामवाली समझते हैं," "पैसा अपने पास रखना," "ज्यादा घुलना-मिलना मत" – ये बातें मीरा के व्यवहार में जहर घोलने लगी थीं।

कुछ महीनों बाद खबर आई कि उदयपुर में अम्माजी (कावेरी देवी) आंगन में फिसल गई हैं और उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई है। विक्रम घबरा गया। उसने मीरा से कहा, "हमें तुरंत निकलना होगा, मां को हमारी ज़रूरत है।"

मीरा ने माथे पर शिकन लाते हुए कहा, "विक्रम, अगले महीने मेरे भाई सुमित की शादी है। मुझे शॉपिंग करनी है, डांस प्रैक्टिस करनी है। अभी वहां जाकर मैं बीमार की सेवा में कैसे फंस सकती हूं? आप रश्मि दीदी को बुला लीजिए ना।"

विक्रम को पहली बार मीरा पर बहुत गुस्सा आया। उसने कड़े शब्दों में कहा, "मीरा, वो मेरी मां हैं और तुम्हारा भी कुछ फर्ज बनता है। तुम हफ्ता भर वहां संभाल लो, फिर दीदी आ जाएंगी।"

बेमन से मीरा उदयपुर गई। हवेलीनुमा घर में ससुरजी (रामनाथ जी) और बिस्तर पर पड़ी अम्माजी ने बहू को देख राहत की सांस ली। लेकिन मीरा का मन वहां नहीं था। जैसे ही दस दिन बाद ननद रश्मि आई, मीरा ऐसे भागी जैसे जेल से रिहा हुई हो। पुणे जाकर उसने भाई की शादी में लाखों खर्च किए, गहने खरीदे और खूब मौज-मस्ती की। उधर उदयपुर में सास कैसी है, यह पूछने के लिए उसने एक बार भी फोन नहीं किया।

अतिथि या बोझ?

कुछ समय बाद, विक्रम ने बताया कि उसके माता-पिता इलाज के सिलसिले में मुंबई आ रहे हैं और कुछ दिन उनके साथ रहेंगे। मीरा भड़क गई। उसने तुरंत अपनी मां को फोन लगाया।

लता जी ने कान भरते हुए कहा, "बेटा, सतर्क रहना। अगर एक बार बुड्ढे-बुढ़िया वहां जम गए, तो तेरा सुख-चैन छिन जाएगा। उन्हें ऐसा महसूस कराना कि वे वहां मेहमान हैं, घर के मालिक नहीं।"

जब रामनाथ जी और कावेरी देवी मुंबई आए, तो मीरा का व्यवहार बहुत रूखा था। कावेरी देवी, अपने टूटे पैर के बावजूद, रसोई में मदद करने की कोशिश करतीं। एक दिन उन्होंने देखा कि मीरा बची हुई सब्जी फेंक रही है।

कावेरी जी ने प्यार से कहा, "बहू, इस सब्जी के तो अच्छे पराठे बन सकते हैं। अन्न का अपमान नहीं करते, दुनिया में बहुत लोगों को यह नसीब नहीं होता।"

मीरा को यह बात चुभ गई। उसने विक्रम से रात को झगड़ा किया, "तुम्हारी मां मुझे सिखाएंगी कि घर कैसे चलाना है? यह कंजूसी उदयपुर में चलती होगी, यहां मुंबई में नहीं।"

बात बढ़ती गई। एक दिन मीरा ने जानबूझकर ऊंची आवाज़ में विक्रम से कहा, "मैं इस दखलअंदाजी से तंग आ चुकी हूं। इनका अपना घर है, ये वहां क्यों नहीं रहते? मुझे अपनी निजता चाहिए!"

दरवाजे के पीछे खड़े बुजुर्ग माता-पिता ने सब सुन लिया। अगले ही दिन, बिना कुछ कहे, वे अपनी दवाइयां समेटकर वापस उदयपुर चले गए। विक्रम अंदर से टूट गया, लेकिन मीरा को लगा कि उसने अपनी आज़ादी वापस पा ली है।

जीवन का कड़वा सच

समय का पहिया घूमा। मंदी की लहर आई और विक्रम की कंपनी बंद हो गई। रातों-रात उसकी अच्छी-खासी नौकरी चली गई। सेविंग्स खत्म होने लगीं, और मुंबई जैसे शहर में ईएमआई और खर्चों का बोझ उठाना मुश्किल हो गया।

मीरा घबरा गई। उसे लगा कि अब मायके वाले ही काम आएंगे। उसने उम्मीद भरी नज़रों से फोन उठाया और अपनी मां को सब बताया। उसे यकीन था कि मां कहेगी, "तुम दोनों पुणे आ जाओ।"

लेकिन उधर से लता जी की आवाज़ बदली हुई थी। "अरे... यह तो बहुत बुरा हुआ। लेकिन मीरा, अभी तेरे भाई की नई-नई शादी हुई है। घर छोटा है, और नई भाभी के सामने ननद-बहनोई का यूं आकर रहना अच्छा नहीं लगेगा। समाज क्या कहेगा? तुम लोग अपने ससुराल, उदयपुर क्यों नहीं चले जाते? हवेली है, तेरे ससुर की पेंशन आती है, वे आराम से संभाल लेंगे।"

मीरा के पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस मां ने उसे हमेशा ससुराल के खिलाफ भड़काया, आज मुसीबत में उसी मां ने अपने दरवाजे बंद कर लिए और उसे उसी 'ससुराल' की तरफ धकेल दिया।

पश्चाताप और अपनापन

तभी विक्रम का फोन बजा। स्क्रीन पर 'बाबूजी' का नाम था। विक्रम की हिम्मत नहीं थी कि वह अपनी बेरोजगारी की बात बताए, लेकिन पिता को सब खबर लग चुकी थी।

रामनाथ जी ने भारी आवाज़ में कहा, "विक्रम, फोन स्पीकर पर डालो।"

फिर उनकी आवाज़ गूंजी, "बेटा, तुमने हमें इतना पराया कर दिया कि इतनी बड़ी मुसीबत अकेले झेल रहे हो? और मीरा बहू..."

मीरा शर्म से गड़ी जा रही थी। तभी पीछे से कावेरी अम्मा की आवाज़ आई, "बच्चों, फिक्र मत करो। यह घर, यह ज़मीन-जायदाद सब तुम्हारा ही तो है। तुम दोनों पहली ट्रेन पकड़कर घर आ जाओ। तुम्हारी पुरानी नौकरी गई है, हौसला नहीं। हम सब साथ रहेंगे तो हर मुश्किल आसान हो जाएगी।"

सास-ससुर का यह निस्वार्थ प्रेम और अपनापन देखकर मीरा का अहंकार चकनाचूर हो गया। वह फूट-फूट कर रोने लगी। उसने कांपती आवाज़ में कहा, "मांजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं बहुत बुरी हूं..."

"चुप कर पगली, बच्चे गलती करते हैं, पर मां-बाप उन्हें दिल से नहीं निकालते। घर आ जा," कावेरी जी ने स्नेह से कहा।

उस रात मीरा को समझ आ गया कि खून के रिश्तों से बड़े 'भाव' के रिश्ते होते हैं। उसने विक्रम का हाथ थामकर माफी मांगी। अगले दिन जब वे उदयपुर की ट्रेन में बैठे, तो मीरा के मन में मां की चालाक नसीहतें नहीं, बल्कि सास का दिया हुआ वह अपनापन गूंज रहा था।

सीख: शादी के बाद एक लड़की के लिए उसका ससुराल ही उसकी कर्मभूमि और असली आश्रय होता है। मायके का मोह और दूसरों की (भले ही वो मां हो) नकारात्मक सलाह आपके बसे-बसाए घर को उजाड़ सकती है। रिश्तों की कद्र करना सीखें, क्योंकि मुसीबत में जो हाथ थामे, वही अपना है।

लेखक : प्रेमचंद कुमार

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