सूना आँगन और माधव काका की पुकार
हमारे गाँव के उस पुराने घर के आँगन में लगी तुलसी भी आज मुरझाई सी लग रही थी। अभी कुछ ही दिन तो हुए थे सुमित्रा काकी को गए हुए। उम्र यही कोई ८०-८२ रही होगी, लेकिन चेहरे पर एक ऐसा तेज था जो बीमारी भी नहीं छीन पाई थी। पिछले तीन महीनों से वो खाट पर थीं, न अन्न का दाना गले से नीचे उतरता था, न पानी की बूँद। मानो शरीर ने साथ छोड़ दिया था, पर प्राण कहीं अटके हुए थे।
और प्राण अटकते भी क्यों न? उनकी जान तो उनके 'भोले' यानी मेरे माधव काका में बसती थी। माधव काका, जो उम्र में काकी के बराबर ही थे, पर दिमागी तौर पर एक मासूम बच्चे जैसे। बचपन में गाँव के मेले में एक बिड़के हुए सांड ने उन्हें ऐसी टक्कर मारी थी कि शरीर तो बच गया, पर दिमाग वहीं ठिठक गया। कभी-कभी उन्हें दौरे पड़ते, तो वो सुध-बुध खो बैठते।
सुमित्रा काकी के तेरहवीं के बाद भी घर का माहौल बड़ा अजीब था। काका अब भी अपनी लाठी टेकते हुए पूरे घर में काकी को ढूँढते फिरते हैं। कभी रसोई की चौखट पर खड़े होकर आवाज लगाते, "अरी सुमित्रा! मेरी चाय ठंडी हो रही है, कहाँ रह गई?" घर के बच्चे जब उन्हें रोकने की कोशिश करते, तो वो झुंझला जाते। मामाजी ने बड़ी मुश्किल से उन्हें अपने कमरे में सुलाया है, यह झूठ बोलकर कि "सुमित्रा मायके गई है, कल आएगी।" दवाइयों के नशे में वो सो तो जाते हैं, पर उनकी बेचैनी देखकर कलेजा मुँह को आता है।
महलों की रानी और फकीर का साथ
माधव काका और सुमित्रा काकी की जोड़ी, मानो शिव और सती की जोड़ी थी। काकी एक बहुत ही साधारण किसान परिवार से थीं, और काका? वो तो गाँव के सबसे बड़े जमींदार के इकलौते बेटे थे। काकी दिखने में साक्षात देवी, रंग ऐसा जैसे कच्चा दूध और नयन-नक्श ऐसे कि कोई भी देखते ही रह जाए। काका भी अपनी जवानी में किसी राजकुमार से कम नहीं लगते थे, बस वो 'भोलापन' उनकी आँखों में झलकता था।
काका के पिता ने अपने रसूख से उन्हें सरकारी नौकरी तो दिलवा दी थी, पर दफ्तर की राजनीति और काका का सीधापन... बात बनी नहीं। लेकिन सुमित्रा काकी ने कभी काका की कमी को उनकी कमजोरी नहीं बनने दिया। वो उनकी ढाल बनकर खड़ी रहीं। काकी कभी अकेले मायके नहीं गईं, यहाँ तक कि हमारे घर भी आती थीं, तो काका की उंगली पकड़े हुए। उनकी दुनिया बस काका से शुरू होकर काका पर ही खत्म होती थी।
स्वाभिमान की लड़ाई और घर का त्याग
गाँव वाले आज भी उस किस्से को याद करते हैं। काका की माँ, यानी मेरी बड़ी नानी, को काकी की सुंदरता और हुनर तो दिखता था, पर वो उनकी गरीबी को कभी भूला नहीं पाईं। वो काकी पर ताने कसतीं, और काकी सब कुछ हँस कर सह लेतीं क्योंकि वो जानती थीं कि माधव काका को जब दौरा पड़ता है, तो सिर्फ काकी का प्यार ही उन्हें शांत कर सकता है।
लेकिन सब्र का बाँध उस दिन टूटा जब काका की माँ ने काकी पर हाथ उठा दिया। वजह बस इतनी थी कि काकी ने काका को उनकी पसंद की खीर ज्यादा दे दी थी। उस दिन मेरे भोले माधव काका, जो कभी ऊँची आवाज़ में नहीं बोलते थे, अपनी माँ के सामने दीवार बनकर खड़े हो गए। उन्होंने कुछ कहा नहीं, बस काकी का हाथ थामा और उस बड़ी हवेली से निकल गए।
काकी रोती रहीं, "जी, त्योहार का दिन है, माँ जी से ऐसे नहीं रूठते।" पर काका ने मुड़कर नहीं देखा। वो एक छोटे से कच्चे मकान में आ गए। जमींदार पिता ने जायदाद से बेदखल कर दिया, पर काका ने अपनी 'सुमित्रा' के आत्मसम्मान के आगे करोड़ों की दौलत को ठोकर मार दी। वो दिन था और आज का दिन, काका ने दोबारा उस हवेली की सीढ़ियाँ नहीं चढ़ीं।
वो एक वाकया: जब काकी बनीं शेरनी
मुझे बचपन की एक यात्रा याद है। हम सब बस से 'गंगा स्नान' के लिए जा रहे थे। बस खचाखच भरी थी। सामने वाली सीट पर शहर की दो आधुनिक युवतियाँ बैठी थीं। काका बार-बार खिड़की से बाहर देखकर बच्चों की तरह तालियाँ बजा रहे थे। उन लड़कियों ने काका को देख कानाफूसी शुरू कर दी और हँसने लगीं। एक ने तो यह भी कह दिया, "अरे, ये पागल आदमी को घर पर क्यों नहीं रखते?"
बस फिर क्या था! मेरी शांत स्वभाव वाली सुमित्रा काकी, साक्षात चंडी बन गईं। उन्होंने उन लड़कियों की आँखों में आँखें डालकर जो क्लास लगाई, पूरी बस सन्न रह गई।
काकी ने कड़कती आवाज़ में कहा था, "ये पागल नहीं, दुनिया के सबसे साफ़ दिल इंसान हैं। कमी इनमें नहीं, तुम्हारी परवरिश और नजरिये में है। पढ़े-लिखे होने का मतलब दूसरों का मजाक उड़ाना नहीं होता। अगर दोबारा इनकी तरफ उंगली भी उठाई, तो मुझसे बुरा कोई न होगा!"
वो लड़कियाँ शर्म से पानी-पानी हो गईं और सीट बदल ली। उस दिन मुझे समझ आया कि एक औरत अपने पति के लिए पूरी दुनिया से लड़ सकती है।
अधूरी मुराद और विडंबना
सुमित्रा काकी को मौत का डर नहीं था, उन्हें डर था तो बस इस बात का कि "मेरे बाद माधव का क्या होगा?" पुराने ख्यालातों की होते हुए भी वो हमेशा कहती थीं, "हे कान्हा! या तो माधव को पहले ले जा, या हमें साथ ले जा। मैं सुहागन मरने की चाह नहीं रखती, मैं बस 'सेकंड' भर भी इन्हें अकेला छोड़ने की हिम्मत नहीं रखती।"
गाँव की औरतें काकी की अर्थी को देखकर कह रही थीं, "बड़ी भागवान थी सुमित्रा, भरे-पूरे परिवार के सामने, सुहागन मरी है। सोने की सीढ़ी चढ़ेगी।"
लेकिन मैं कोने में खड़े माधव काका को देख रही थी। उनकी पथराई आँखों में वो सवाल देख रही थी जो शायद कोई नहीं समझ पा रहा था। काकी 'सुहागन' तो गईं, पर अपनी सबसे बड़ी चिंता, अपनी सबसे बड़ी जिम्मेदारी को पीछे छोड़ गईं। हम सब कहते हैं कि वो 'सौभाग्यवती' थीं, पर क्या सच में? काकी का शरीर तो चला गया, पर मुझे लग रहा था कि उनकी आत्मा अब भी वहीं, काका के सिरहाने बैठी, उनके बालों में उंगलियाँ फेर रही है, क्योंकि जीते-जी तो क्या, मरने के बाद भी वो काका को अकेला नहीं छोड़ सकती थीं।
विधि के विधान के आगे हम सब कितने बेबस हैं। काकी की वो अंतिम इच्छा अधूरी रह गई, और अब काका इस भरी दुनिया में बिल्कुल अकेले रह गए, जैसे किसी बच्चे का हाथ मेले में छूट गया हो।
सीख: सच्चा प्रेम केवल साथ जीने में नहीं, बल्कि एक-दूसरे की ढाल बनने में है। समाज की नज़रों में 'सुहागन' मरना सौभाग्य हो सकता है, लेकिन एक पत्नी के लिए उसका सबसे बड़ा सौभाग्य उसके पति की सुरक्षा और साथ होता है, जिसके आगे स्वर्ग का सुख भी फीका है।
