मन की शांति या पड़ोसी धर्म? सुधा ने ऐसे सिखाया सुलोचना को सबक

मन की शांति या पड़ोसी धर्म? सुधा ने ऐसे सिखाया सुलोचना को सबक

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मन की बेचैनी और आंगन की तुलसी

आज सुबह से ही सुधा के हाथ काम में नहीं लग रहे थे। आंगन में तुलसी के पौधे को जल चढ़ाते समय भी उसका मन कहीं और ही भटक रहा था। 'कृष्ण कुंज कॉलोनी' के इस शांत माहौल में भी सुधा के भीतर एक तूफ़ान सा चल रहा था। वह स्वभाव से जितनी सौम्य और मिलनसार थी, आज उतनी ही व्यथित थी।

कहते हैं न, "एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है," बस कुछ ऐसा ही हाल सुधा के पड़ोस का हो गया था। सुधा का मानना था कि पड़ोसी तो परिवार का दूसरा रूप होते हैं, सुख-दुख के पहले साथी। लेकिन अब उसे लगने लगा था कि अपनी मानसिक शांति के लिए कुछ लोगों से 'राम-राम' दूर से ही करना बेहतर है।

सुलोचना: कॉलोनी की 'नारद मुनि'

कॉलोनी के कोने वाले मकान में रहने वाली सुलोचना का बस एक ही काम था—इधर की आग उधर लगाना। सुलोचना दिखने में तो संभ्रांत लगती थी, लेकिन उसकी जुबान कैंची की तरह चलती थी। सुबह का नाश्ता होते ही वह कॉलोनी का चक्कर लगाने निकल पड़ती।

सुलोचना का अपना एक अलग ही तर्क था। उसे अपने पति की सरकारी नौकरी और पैसों का बड़ा गुमान था। वह अक्सर अपनी साड़ियों और गहनों का प्रदर्शन करती, लेकिन जब कॉलोनी में कोई भंडारा हो या नवरात्रि का जागरण, तो काम करने के समय वह गायब हो जाती। हाँ, जैसे ही प्रसाद बंटने का समय आता या कार्यक्रम खत्म होता, वह सबसे आगे खड़ी होकर नुस्खे निकालने लगती— "अरे! खीर में चीनी कम रह गई," या "सजावट में वो बात नहीं आई।"

उसका सबसे प्रिय शगल था—"मुँह में राम, बगल में छुरी।" जिसके घर बैठती, उसी की चाय पीती और बाहर निकलते ही उसी की बुराई शुरू कर देती।

सुधा का संघर्ष और कर्मठता

दूसरी ओर सुधा थी, जो एक पल भी व्यर्थ गँवाना पाप समझती थी। घर के काम-काज निपटाने के बाद वह अपने हुनर को निखारने में समय बिताती। वह घर से ही सिलाई-कढ़ाई का छोटा सा काम करती थी और अचार-पापड़ बनाकर आस-पास की दुकानों पर भिजवाती थी। उसे अपनी मेहनत की कमाई और आत्मनिर्भरता पर गर्व था।

सुधा का स्वभाव था कि यदि पड़ोस में किसी के यहाँ बीमारी हो या कोई मुसीबत, तो वह बिना बुलाए मदद को पहुँच जाती। लेकिन वह फालतू की गप्पबाजी के लिए किसी के घर जाकर घंटों बैठना पसंद नहीं करती थी।

सुलोचना को सुधा की यह व्यस्तता खलती थी। वह अक्सर ताना मारती, "अरे सुधा, तुम तो मशीन बन गई हो। थोड़ा आराम भी कर लिया करो, हमारे पास बैठकर दो बातें कर लिया करो।" सुधा मुस्कुरा कर टाल देती, क्योंकि वह जानती थी कि सुलोचना के पास 'दो बातें' नहीं, बल्कि 'सौ बुराइयाँ' होती हैं।

सब्र का बांध और वह कड़वी दोपहर

बात आज दोपहर की है। सुधा अपनी सिलाई मशीन पर एक ज़रूरी ब्लाउज़ सिल रही थी, तभी सुलोचना धमक पड़ी। सुधा ने शिष्टाचार वश उसे बैठने को कहा, लेकिन मन ही मन वह ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी कि सुलोचना जल्दी चली जाए।

सुलोचना ने आते ही सामने वाले वर्मा जी की बहू की बुराई शुरू कर दी। सुधा ने बात बदलने की कोशिश की, "सुलोचना भाभी, छोड़िए न ये सब बातें। आप बताइए, आज खाने में क्या बनाया?"

लेकिन सुलोचना तो जैसे जहर उगलने ही आई थी। उसने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, "तुम्हें पता नहीं है सुधा, दुनिया कितनी चालाक हो गई है। तुम तो बस काम में लगी रहती हो, तुम्हें क्या खबर।"

सुधा ने जब देखा कि सुलोचना की बातें अब मर्यादा लांघ रही हैं, तो उसने टोका, "भाभी, अगर हमें किसी से शिकायत है, तो सीधे उनसे बात करनी चाहिए। पीठ पीछे निंदा करने से क्या हासिल होगा?"

यह सुनते ही सुलोचना का पारा चढ़ गया। उसने तुनक कर कहा, "तुम्हें तो दूसरों के फटे में टांग अड़ाने की बहुत आदत है, सुधा! हम अपनी समस्या खुद सुलझा सकते हैं, हमें तुम्हारे ज्ञान की ज़रूरत नहीं है।"

स्वाभिमान की गूंज

सुलोचना के ये शब्द सुधा के कलेजे में तीर की तरह चुभ गए। वही सुलोचना, जिसके पति से जब उसका झगड़ा हुआ था, तो सुधा ने ही घंटों बैठकर सुलह करवाई थी। वही सुलोचना, जो हर छोटी बात पर सुधा के पास दौड़ी आती थी कि "सुधा, अब मैं क्या करूँ?"

पिछले कुछ दिनों से सुलोचना की लगाई बुझी बातों के कारण सुधा और उसके पति रमेश के बीच भी तनाव हो गया था। सुलोचना ने सुधा के कानों में रमेश के खिलाफ भी कुछ ऐसी बातें भरी थीं, जो सरासर झूठ थीं। सुधा का सिर भारी हो गया। उसे लगा कि अब बहुत हो चुका। "नेकी कर, दरिया में डाल" वाली कहावत अब उसे "नेकी कर, जूते खा" जैसी महसूस हो रही थी।

सुधा ने मशीन का पहिया रोका, अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और सुलोचना की आँखों में आँखें डालकर बोली,

"सुलोचना भाभी, बस बहुत हुआ! किसी के घर में आग लगने से बचाना, किसी के आँसू पोंछना अगर 'फटे में टांग अड़ाना' है, तो हाँ, मैंने यह गलती की है। लेकिन यह मेरे संस्कार हैं, जो मुझे पड़ोसी धर्म निभाना सिखाते हैं।"

सुधा की आवाज़ में एक दृढ़ता थी जो आज से पहले कभी नहीं देखी गई थी।

"लेकिन पड़ोसी धर्म का मतलब यह नहीं कि मैं अपनी मान-मर्यादा और मानसिक शांति को आपके कदमों में रख दूँ। आप अपने घर में खुश रहिए और मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिये। आइंदा मेरे घर आकर दूसरों का कचरा मत फैलाइयेगा। मुझे नकारात्मकता से परहेज़ है।"

सुलोचना का चेहरा पीला पड़ गया। उसे उम्मीद नहीं थी कि सीधी-सादी सुधा उसे आईना दिखा देगी। वह बिना कुछ बोले, पैर पटकती हुई वहाँ से चली गई।

नयी शुरुआत

सुलोचना के जाने के बाद सुधा ने एक गहरी सांस ली। उसे लगा जैसे उसके सीने से कोई भारी बोझ उतर गया हो। उसने अपनी सिलाई मशीन को वापस घुमाना शुरू किया। मशीन की 'खर्र-खर्र' आवाज़ में आज एक अलग ही लय थी—आत्मसम्मान की लय।

सुधा समझ गई थी कि बाड़ लगाना कभी-कभी बहुत ज़रूरी होता है, चाहे वह खेत की हो या रिश्तों की। उसने तय कर लिया कि अब वह 'पड़ोसी धर्म' ज़रूर निभाएगी, लेकिन अपनी शर्तों पर, अपनी आत्म-शांति की कीमत पर नहीं।

सीख: अच्छे संबंध बनाना ज़रूरी है, लेकिन अपनी मानसिक शांति और आत्मसम्मान की रक्षा करना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। नकारात्मक लोगों से दूरी बनाए रखना ही सुखी जीवन की कुंजी है।

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