शहनाइयों के शोर में दबी खामोशी
नर्मदा किनारे बसे उस पुराने, रसूखदार हवेलीनुमा घर में आज पैर रखने की जगह नहीं थी। आंगन में गेंदे के फूलों की लड़ियाँ झूल रही थीं और हलवाई की कढ़ाई से देसी घी की महक पूरे मोहल्ले में फैल रही थी। बाबू रामनाथ की लाडली बिटिया, 'सुमन' के हाथ पीले होने वाले थे। बाहर ढोलक की थाप पर औरतें मंगल गीत गा रही थीं, लेकिन घर के पिछवाड़े वाली अनाज की कोठरी में एक अलग ही सन्नाटा पसरा था।
उस कोठरी की मद्धम रोशनी में बाबू रामनाथ, उनकी धर्मपत्नी कौशल्या देवी और बड़ा बेटा मोहन सिर झुकाए बैठे थे। बाहर का उल्लास मानो यहाँ आकर दम तोड़ रहा था। तीनों के चेहरों पर हवाईयां उड़ रही थीं और माथे पर चिंता की लकीरें साफ पढ़ी जा सकती थीं।
"अब क्या होगा जी? सूरज ढलते ही बारात दरवाजे पर होगी। अगर समधी जी को चढ़ावे के जेवर नहीं मिले, तो हमारी तो नाक ही कट जाएगी!" कौशल्या देवी ने अपने आँचल से आँसू पोंछते हुए कहा। उनका गला रुंधा हुआ था।
बाबू रामनाथ ने हताशा में अपने घुटनों पर हाथ दे मारा। "मैं क्या करूँ कौशल्या? जमींदार साहब ने ऐन मौके पर दगा दे दिया। कहते हैं उनकी खुद की फैक्ट्री में आग लग गई, पैसा नहीं दे पाएंगे। अब इस आखिरी वक्त में, मैं कहाँ जाऊँ? किसके आगे झोली फैलाऊँ?" उनके स्वर में बेबसी थी, जैसे पैरों तले से जमीन खिसक गई हो।
मुसीबत का पहाड़
मोहन भी दीवार से सटकर खड़ा था, उसकी आँखों में पिता की बेबसी देखी नहीं जा रही थी। उसने धीमे स्वर में कहा, "बाबूजी, मैंने दफ्तर में बात की थी, लेकिन पिछले महीने ही तो मकान की मरम्मत के लिए कर्जा लिया था। अब और कोई उधार देने को राजी नहीं है। सुनार ने भी साफ कह दिया है कि बिना नकद के वह गहने पोटली से बाहर नहीं निकालेगा।"
कौशल्या देवी का रोना तेज हो गया, "हाय राम! मेरी बड़ी बेटी सरला की शादी में तो मैंने अपने बचे-खुचे कंगन भी बेच दिए थे। अब तो मेरे पास सुहाग की निशानी के अलावा फूटी कौड़ी नहीं बची। सुमन का कन्यादान कैसे होगा?"
घर की इज्जत दांव पर लगी थी। यह वही समय था जब 'हाथ-पाँव फूलने' लगते हैं। बाहर शहनाई बज रही थी, लेकिन कोठरी के अंदर तीनों की धड़कनें किसी अनहोनी की आशंका से तेज थीं। उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था।
अपमान का कड़वा घूंट
तभी दरवाजे पर एक हल्की आहट हुई। मोहन की पत्नी, और इस घर की बड़ी बहू 'सुधा', हाथों में पानी का जग और गिलास लेकर भीतर आई। उसका रंग पक्का था, साँवला-सलोना, लेकिन नैन-नक्श तीखे थे। उसे देखते ही कौशल्या देवी का गुस्सा और झुंझलाहट सातवें आसमान पर पहुँच गया।
"अरे! तुम यहाँ क्या कर रही हो?" कौशल्या देवी ने उसे झिड़क दिया। "बाहर मेहमान पानी को तरस रहे होंगे और तुम यहाँ खड़ी तमाशा देख रही हो? जाओ, अपना काम देखो! वैसे भी समझदारी की बातें तुम्हारे पल्ले नहीं पड़ने वालीं।"
सुधा के कदम ठिठक गए। यह पहली बार नहीं था। शादी के तीन साल बाद भी उसे अपने सांवले रंग के कारण सास और ननदों के ताने सुनने पड़ते थे। कौशल्या देवी को अपनी गोरी बेटियों पर गुमान था, और सुधा का सांवलापन उन्हें हमेशा खटकता था। जैसे 'आँख का कांटा' हो।
सुधा की आँखें भर आईं, लेकिन उसने अपनी मर्यादा नहीं लांघी। वह चुपचाप पानी रखकर मुड़ने ही वाली थी कि बाबू रामनाथ ने उसे रोक लिया।
"रुको बहू!" रामनाथ जी की आवाज में एक अधिकार और दर्द दोनों था। उन्होंने अपनी पत्नी को घूरते हुए कहा, "कौशल्या, रंग-रूप तो ईश्वर की देन है, लेकिन यह हमारे घर की लक्ष्मी है। आज घर पर विपदा आई है, तो इसे भी जानने का हक है।"
बाबूजी ने भारी मन से सुधा को सारी बात बता दी कि कैसे पैसों की कमी के कारण सुमन की विदाई और गहनों पर संकट आ गया है।
फर्ज की कसौटी
सब कुछ सुनकर सुधा के चेहरे पर एक पल के लिए भी शिकन नहीं आई। वह बिना कुछ बोले तेजी से कोठरी से बाहर निकल गई। कौशल्या देवी ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, "लो, सुन ली रामकथा! अब जाकर अपने कमरे में आराम फरमाएगी।"
लेकिन पांच मिनट बाद जब सुधा लौटी, तो उसके हाथों में एक मखमली लाल संदूकची थी। कोठरी में सन्नाटा छा गया। सुधा ने वह संदूकची अपनी सास कौशल्या देवी के हाथों में रख दी।
उसने दृढ़ता से कहा, "मां जी, इसमें मेरी शादी के चढ़ावे के सारे गहने हैं। ये भारी सेट, कंगन, और हार... ये सब असली सोने के हैं। आप इन्हें सुनार को दे आइए और सुमन के लिए नए गहने ले लीजिए। या इन्हीं को पोलिश करवाकर उसे दे दीजिए।"
कौशल्या देवी हक्का-बक्का रह गईं। मोहन भी अपनी पत्नी को अविश्वास से देख रहा था।
सुधा ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, "मां जी, गहने तो फिर बन जाएंगे, लेकिन अगर आज आंगन से बारात बिना इज्जत के लौटी, तो वह दाग कभी नहीं धुलेगा। मैं इस घर की बहू हूँ, अगर घर की साख ही नहीं रहेगी, तो मैं इन गहनों का क्या करूँगी? मेरे लिए मेरे ससुराल की पगड़ी से बढ़कर कोई आभूषण नहीं है।"
सोने से भी खरा मन
कौशल्या देवी के हाथों में वह संदूकची कांपने लगी। उनकी आँखों से अब जो आँसू गिरे, वे चिंता के नहीं, पश्चाताप के थे। उन्होंने जिस बहू को हमेशा उसके रंग के लिए कोसा, आज उसी ने उनके कुल की लाज बचा ली थी। यह तो वही बात हुई कि 'गुदड़ी में लाल' छिपा था और वे उसे पत्थर समझती रहीं।
कौशल्या देवी ने आगे बढ़कर सुधा को गले लगा लिया और फफक कर रो पड़ीं। "मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची! मैं ही अंधी थी जो तेरे गोरे मन को नहीं देख पाई। मैं चमड़ी का रंग देखती रही और तूने आज साबित कर दिया कि असली कुंदन तो तू ही है।"
सुधा ने धीमे से मुस्कुराते हुए अपनी सास के चरण स्पर्श किए और कहा, "मां, मैंने तो बस एक बेटी और बहू का धर्म निभाया है। आप बस जल्दी कीजिए, शुभ मुहूर्त का समय हो रहा है।"
बाबू रामनाथ ने अपनी बहू के सिर पर हाथ रखा। उनकी आँखों में गर्व था। आज कोठरी का अंधेरा छंट चुका था, और घर के आंगन में बज रही शहनाई अब उन्हें सुरीली लगने लगी थी।
सीख: किसी भी व्यक्ति की परख उसके बाहरी रंग-रूप से नहीं, बल्कि उसके संस्कारों और समय पर काम आने वाले त्याग से होती है। सच्चा सौंदर्य मन का होता है, तन का नहीं।
