स्वर्ण जयंती का वो खास दिन
बनारस के दशाश्वमेध घाट के पास स्थित भव्य बैंक्वेट हॉल के बाहर गाड़ियों का तांता लगा हुआ था। आज ‘रघुनंदन विला’ की रौनक देखते ही बनती थी। घर की matriarch, सुमित्रा देवी और उनके पति राघव बाबू की शादी की 50वीं सालगिरह थी। सत्तर की उम्र पार कर चुकीं सुमित्रा जी आज अपनी गहरी मरून रंग की बनारसी साड़ी में किसी नई नवेली दुल्हन से कम नहीं लग रही थीं। माथे पर बड़ी सी बिंदी और मांग में सजा सिंदूर उनके चेहरे के तेज को और बढ़ा रहा था।
बाहर पोते-पोतियां और बहुएं कब से गाड़ी में बैठकर हॉर्न बजा रहे थे, "दादी माँ! जल्दी आइये, मुहूर्त का समय हो रहा है!" लेकिन सुमित्रा जी ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठीं, अपनी कलाई को सूना देखकर कुछ ठिठक गई थीं। तभी उनकी नज़र मखमली डिब्बे में रखे उन दो सोने के कंगनों पर पड़ी। एक पल के लिए उनके चेहरे पर वो पुरानी, मीठी सी मुस्कान तैर गई। उन्होंने डिब्बा खोला और वो कंगन अपनी झुर्रियों वाली कलाइयों में डाल लिए।
सच ही तो है, इन दो कंगनों के बिना उनका सोलह श्रृंगार अधूरा था। ये सिर्फ गहने नहीं थे, ये उनके और राघव बाबू के पचास सालों के संघर्ष और प्रेम की निशानी थे।
अतीत के झरोखे से: वो कच्ची गृहस्थी
गाड़ियों के हॉर्न की आवाज़ मद्धम पड़ गई और सुमित्रा जी का मन पचास साल पीछे चला गया। मध्यम वर्गीय परिवार की उस शादी में 'जितनी चादर हो उतने ही पैर पसारने' की रीत थी। सुमित्रा के मायके वालों ने हैसियत के हिसाब से सब कुछ दिया था, लेकिन सोने के कंगन बनवाना उनके बस की बात नहीं थी। विदाई के समय माँ ने कहा था, "सुमी, ससुराल से चढ़ावे में जो कंगन आएंगे, वही तेरी असली पूँजी होंगे।"
ससुराल में गृह-प्रवेश हुआ। सुमित्रा ने देखा कि चढ़ावे में आए वो भारी कंगन बहुत सुंदर थे। मन ही मन खुश हुई कि चलो, ससुराल में मान रह गया। लेकिन वो खुशी बस चार दिन की चांदनी साबित हुई। 'मुंह दिखाई' की रस्म खत्म होते ही सासू माँ ने फरमान सुना दिया, "बहू, अभी घर में ननद की शादी है और हाथ तंग है। तुम्हारे ये कंगन और बाकी भारी जेवर मेरे पास जमा कर दो, सुरक्षित रहेंगे।"
सुमित्रा जी ने संस्कारी बहू की तरह सब कुछ सौंप दिया। कुछ महीनों बाद ननद की शादी हुई और सुमित्रा ने देखा कि उनके वही कंगन, सुनार से तुड़वाकर नए डिजाइन में ननद को पहना दिए गए थे। दिल पर जैसे किसी ने पत्थर रख दिया हो, पर जुबान सिल ली। देवर की शादी में भी जब बात आई, तो सासू माँ ने साफ़ कह दिया, "अरे, बारात बस से दूसरे शहर जानी है, चोर-उचक्कों का डर है। सुमित्रा तुम कांच की चूड़ियाँ पहन लो, वही शुभ होती हैं।" उधर देवरानी के हाथों में नए कड़े खनक रहे थे। सुमित्रा जी को लगा जैसे उनका मन ही कांच की चूड़ियों की तरह चटक गया हो।
स्कूटर बनाम कंगन: एक मूक प्रेम कथा
राघव बाबू उस समय एक छोटी सी प्राइवेट नौकरी करते थे और परिवार से अलग होकर शहर के पुराने मोहल्ले में एक किराए के मकान में रहने लगे थे। संयुक्त परिवार से अलग होने के बाद जीवन की गाड़ी खींचना आसान नहीं था। राघव बाबू अपनी पुरानी खटारा साइकिल से मीलों दूर ऑफिस जाते थे। पसीने में लथपथ जब वो शाम को घर लौटते, तो सुमित्रा का दिल भर आता। वो अक्सर कहतीं, "सुनिए, आप एक सेकंड हैंड स्कूटर क्यों नहीं ले लेते? रोज इतनी थकान हो जाती है आपको।"
राघव बाबू हर बार हंसकर टाल देते, "अरे सुमो, साइकिल से सेहत अच्छी रहती है। अभी पैसे जमा कर रहा हूँ, देखना एक दिन अपनी कोठी होगी।"
कुछ महीने बीते। एक शाम राघव बाबू घर आए और सुमित्रा के हाथ में एक डिब्बा रख दिया। सुमित्रा ने खोला तो देखती रह गईं—उसमें सोने के दो कंगन जगमगा रहे थे।
"माँ से बात की थी मैंने," राघव बाबू ने नजरें चुराते हुए कहा, "माँ ने पुराने गहनों के बदले कुछ पैसे दिए थे, बाकी मैंने मिला दिए। तुम्हारे हाथ अब सूने नहीं रहेंगे।"
सुमित्रा की आँखों में आंसू आ गए। वो कंगन पहनकर पूरे घर में इतराती फिरीं। लेकिन यह खुशी भी ज्यादा दिन नहीं टिकी। एक दिन घर की सफाई करते हुए उन्हें राघव की पासबुक मिल गई। उसमें से एक बड़ी रकम उसी तारीख को निकाली गई थी जिस दिन कंगन आए थे। और रकम के आगे लिखा था—'स्कूटर फंड'।
सुमित्रा सन्न रह गईं। राघव बाबू ने झूठ बोला था। माँ ने कोई पैसे नहीं दिए थे। उन्होंने अपने स्कूटर के लिए जो-जो पैसा, पाई-पाई करके जोड़ा था, उससे सुमित्रा के कंगन खरीद लिए थे। और खुद वही टूटी साइकिल घसीट रहे थे। सुमित्रा को वो कंगन अब काट रहे थे। प्रेम का यह रूप देखकर उनका गला भर आया।
त्याग की नींव पर खड़ा साम्राज्य
अगले ही हफ्ते सुमित्रा की मुंहबोली बहन विमला को अपनी बेटी की शादी के लिए गहने खरीदने थे। सुमित्रा ने बिना राघव को बताए, वो कंगन विमला को बेच दिए। उसी शाम, जब राघव घर लौटे, तो दरवाजे पर एक चमचमाता हुआ स्कूटर खड़ा था। चाबी राघव के हाथ में रखते हुए सुमित्रा ने कहा, "देखो, कंगन तो फिर बन जाएंगे, लेकिन आपके पैरों में पड़े छाले मुझसे नहीं देखे जाते। ये स्कूटर हमारी गृहस्थी की गाड़ी को रफ़्तार देगा।"
राघव बाबू कुछ बोल न सके, बस सुमित्रा का हाथ थाम लिया। उस दिन दोनों ने बिना कहे एक-दूसरे से वादा किया कि चाहे कुछ भी हो, एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे।
कहते हैं, जिस घर में स्त्री का त्याग और पुरुष का समर्पण हो, वहां लक्ष्मी को आना ही पड़ता है। समय बदला। राघव बाबू ने अपना व्यापार शुरू किया। मेहनत रंग लाई। किराए के मकान से फ्लैट, और फ्लैट से आज बनारस के पॉश इलाके में यह आलीशान कोठी। व्यापार बढ़ने के बाद राघव बाबू ने सुमित्रा जी को न जाने कितने ही सेट, हीरे और जड़ाऊ कंगन दिलवाए, लेकिन उन पहले कंगनों की याद हमेशा खास रही।
शायद यही वजह थी कि जब उनके दोनों बेटों की शादियां हुईं, तो सुमित्रा जी ने सबसे पहले दोनों बहुओं के नाम बैंक लॉकर खुलवाए और चाबियां उनके हाथ में दीं। उन्होंने कसम खाई थी कि जिस पीड़ा से वो गुजरीं, उनकी बहुएं कभी नहीं गुजरेंगी। उनका मानना था, "गहने तिजोरी की शोभा नहीं, पहनने वाले के आत्मसम्मान की पहचान होते हैं।"
गाड़ी का हॉर्न फिर बजा। सुमित्रा जी यादों से बाहर आईं। कंगन की चमक आज भी वैसी ही थी, जैसे राघव के प्रेम की। उन्होंने पल्लू ठीक किया, आईने में खुद को देखा और एक संतोष भरी मुस्कान के साथ बाहर निकल गईं।
सीख: घर ईंट-पत्थर से नहीं, बल्कि आपसी समझ, त्याग और एक-दूसरे की छोटी-छोटी खुशियों का ख्याल रखने से बनता है। प्रेम में किया गया समझौता, समझौता नहीं बल्कि रिश्ते की सबसे मजबूत नींव होती है।
