लखनऊ की शाम और खामोश आंगन
लखनऊ के गोमती नगर के एक पुराने, लेकिन रईसी मकान में तिवारी परिवार रहता था। घर के आंगन में एक बड़ा सा तुलसी का चौरा था, जिसके पास शाम को दिया जलाना सावित्री देवी का सबसे प्रिय काम था। घर के मुखिया थे रामेश्वर तिवारी, जो अब रिटायर्ड थे। उनकी पत्नी सावित्री देवी, जो पुराने ख्यालातों की एक आदर्श गृहिणी थीं। उनका बेटा विकास और उसकी पत्नी रिया, जो एक बड़ी आईटी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर थी। और इन सबके ऊपर थीं घर की सबसे बुजुर्ग, विकास की दादी और सावित्री की सास, कल्याणी अम्मा।
घर बाहर से जितना सुंदर था, अंदर रिश्तों में उतनी ही अजीब सी एक खामोशी थी। सावित्री देवी का जीवन रसोई के मसालों, पूजा की थाली और घर की साफ-सफाई में बीतता था। उनके पास आज भी वही पुराना नोकिया का बटन वाला फोन था, जिसे वो सिर्फ 'बेटा कब आ रहे हो?' पूछने के लिए इस्तेमाल करती थीं। दूसरी तरफ, रिया का जीवन लैपटॉप की स्क्रीन, ज़ूम मीटिंग्स और कानों में लगे ब्लूटूथ हेडफोन के इर्द-गिर्द घूमता था।
सावित्री जी को रिया का यह तौर-तरीका बिल्कुल नहीं भाता था। जब भी वो रिया के कमरे में जातीं, तो उसे स्क्रीन में खोया हुआ पातीं। उन्हें लगता, "यह कैसी नौकरी है? न हाथ चल रहे हैं, न पैर, बस उंगलियां चल रही हैं और मुंह बंद है। क्या घर के बड़ों के लिए इसके पास दो पल का समय नहीं है?" यह बात सावित्री जी के मन में एक कांटे की तरह चुभती रहती थी।
तनाव का विस्फोट
घर में एक अजीब सा 'शीत युद्ध' चल रहा था। सावित्री जी अक्सर रसोई में बर्तनों को थोड़ा जोर से पटकते हुए बड़बड़ातीं, "आजकल की बहुएं भी न... बस मशीनों से रिश्ता है, इंसानों से नहीं। हम तो जैसे घर के पुराने फर्नीचर हो गए हैं, पड़े रहो एक कोने में।"
कल्याणी अम्मा अपने तख्त पर लेटीं सब देखती रहती थीं। वो जानती थीं कि 'ताली एक हाथ से नहीं बजती'। रिया काम के बोझ तले दबी थी और सावित्री अकेलेपन की शिकार थीं।
एक उमस भरी दोपहर, सावित्री जी ने सोचा कि आज तो रिया से बात करके रहेंगी। उन्होंने जानबूझकर रिया के कमरे का दरवाजा जोर से खटखटाया।
"बहू! अरे ओ बहू! जरा बाहर तो आना। अचार की बरनी धूप में रखनी है, मेरा हाथ नहीं पहुँच रहा," सावित्री जी ने आवाज लगाई।
रिया उस वक्त अपनी कंपनी के विदेशी क्लाइंट्स के साथ एक बहुत ही अहम वीडियो कॉल पर थी। स्क्रीन पर प्रेजेंटेशन चल रही थी। सास की आवाज सुनकर उसका ध्यान भटका, लेकिन उसने म्यूट करके इशारा किया कि वो अभी नहीं आ सकती। सावित्री जी को लगा कि बहू ने फिर से अनसुना कर दिया। उनका सब्र का बांध टूट गया।
वो कमरे में घुस गईं और तेज आवाज में बोलीं, "अरे! बहरी हो गई है क्या? कब से आवाज लगा रही हूँ! क्या ये लैपटॉप पेट भरेगा सबका? घर गृहस्ती का भी कोई काम होता है या नहीं?"
रिया के क्लाइंट्स ने सब सुन लिया। शर्मिंदगी और काम के तनाव ने रिया के दिमाग पर हावी होकर उसे आपा खोने पर मजबूर कर दिया। उसने झटके से हेडफोन उतारे और रुआंसे गले से चिल्लाई, "माँ जी! प्लीज! आप समझती क्यों नहीं हैं? मैं यहाँ मजे नहीं कर रही हूँ! अगर मेरी नौकरी चली गई तो क्या होगा? आप बस अचार और पापड़ की दुनिया से बाहर निकलकर देखिए, हम कितनी मेहनत करते हैं!"
कमरे में सन्नाटा छा गया। रामेश्वर जी और विकास भी दौड़े चले आए। सावित्री जी का चेहरा अपमान और दुख से सफेद पड़ गया था। उनकी आँखों में आंसू आ गए, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। वो चुपचाप अपने कमरे में चली गईं और दरवाजा बंद कर लिया।
बड़प्पन की सीख
अगले दो दिन घर में मातम जैसा माहौल रहा। चूल्हा तो जला, पर किसी ने पेट भरकर खाना नहीं खाया। तीसरे दिन शाम को कल्याणी अम्मा ने रिया को अपने पास बुलाया। रिया डरी हुई थी कि दादी सास भी अब उसे डांटेंगी।
अम्मा ने रिया का हाथ अपने हाथ में लिया और प्यार से कहा, "बिटिया, तूने जो कहा वो कड़वा था, पर शायद सच था। लेकिन एक बात सोच... तेरी सास के पास तेरी तरह 'कनेक्शन' नहीं है। उसकी दुनिया सिर्फ इस घर की चारदीवारी है। जब तू लैपटॉप में घुसती है, तो वो खुद को बहुत अकेला महसूस करती है। उसे लगता है कि तू उसे अपनी दुनिया में शामिल नहीं करना चाहती।"
रिया ने सिर झुका लिया। अम्मा ने मुस्कुराते हुए उसके कान में एक मंत्र फूंका, "देख, लोहा ही लोहे को काटता है। अगर तुझे लगता है कि तकनीक ने तुम दोनों के बीच दीवार खड़ी की है, तो उसी तकनीक को पुल बना दे। उसे भी एक स्मार्ट फोन ला दे। फिर देख चमत्कार!"
अम्मा की बात रिया के दिल में उतर गई। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ कि उसने कभी सास को अपनी दुनिया का हिस्सा बनाने की कोशिश ही नहीं की।
नई शुरुआत का उपहार
अगली शाम, रिया एक नया, चमचमाता हुआ स्मार्टफोन लेकर सावित्री जी के कमरे में गई। सावित्री जी खिड़की से बाहर देख रही थीं।
रिया ने धीरे से उनके पैरों को छूआ और फोन उनकी गोद में रख दिया। "माँ जी, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं काम के तनाव में भूल गई थी कि आप मेरा इंतजार करती हैं। यह आपके लिए है। अब से आप बोर नहीं होंगी।"
सावित्री जी ने पहले ना-नुकर की, "अरे, मुझे कहाँ ये सब चलाना आता है... बुढ़ापे में क्या सीखूँगी।"
रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं हूँ न माँ जी, मैं सिखाऊंगी। जैसे आपने मुझे घर के रीति-रिवाज सिखाए, मैं आपको ये नया रिवाज सिखाऊंगी।"
अगले कुछ हफ्तों में तिवारी निवास का नक्शा बदल गया। रिया ने बड़ी शिद्दत से सावित्री जी को व्हाट्सएप चलाना, वीडियो कॉल करना और यूट्यूब पर भजन खोजना सिखाया। सबसे पहले 'बनारस वाली मौसी' को वीडियो कॉल लगाया गया, और बहनों को स्क्रीन पर देख सावित्री जी की खुशी का ठिकाना न रहा।
पासा पलट गया
धीरे-धीरे घर का माहौल खुशमिजाज हो गया। लेकिन कहानी में एक मजेदार मोड़ आया। सावित्री जी अब 'डिजिटल' हो चुकी थीं। सुबह उठते ही 'गुड मॉर्निंग' के मैसेज भेजना और फेसबुक पर कुकिंग वीडियो देखना उनका नया शौक बन गया था।
एक रविवार की सुबह, रामेश्वर जी ने चाय के लिए आवाज लगाई, "अरे सावित्री! दस बज गए, चाय मिलेगी या नहीं?"
अंदर से सावित्री जी की आवाज आई, "रुको जी! अभी 'मसाला चाय' की नई रेसिपी का वीडियो देख रही हूँ, बस 5 मिनट और। और हाँ, विकास के पापा, हो सके तो गैस जलाकर पानी रख दीजिए!"
रामेश्वर जी और विकास एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे। पहले जो सास-बहू आपस में लड़ती थीं, अब वो दोनों सोफे पर बैठकर ऑनलाइन शॉपिंग करती थीं। रिया अपनी सास को दिखा रही थी कि कौन सी साड़ी अच्छी लगेगी और सावित्री जी रिया को बता रही थीं कि कौन सा योगा चैनल अच्छा है।
आंगन में बैठी कल्याणी अम्मा जोर-जोर से हंसने लगीं। रामेश्वर जी ने झुंझलाकर कहा, "अम्मा, तुमने ये क्या करवा दिया? पहले एक बहू व्यस्त थी, अब पत्नी भी हाथ से गई!"
अम्मा ने हंसते हुए अपनी पान की डिबिया खोली और बोलीं, "अरे रामेश्वर, घर की औरतें खुश हैं तो समझो घर स्वर्ग है। अब तुम बाप-बेटे भी थोड़ा आत्मनिर्भर बनो। जाओ, अपनी चाय खुद बनाओ और इन दोनों को भी पिलाओ। आखिर, घर की लक्ष्मी अब ऑनलाइन जो है!"
तिवारी जी और विकास चुपचाप रसोई की तरफ बढ़ गए, और पीछे से सास-बहू के खिलखिलाने की आवाज आ रही थी। वो दीवार गिर चुकी थी, और उसकी जगह एक डिजिटल पुल ने ले ली थी।
सीख: समय और तकनीक के साथ रिश्तों को भी अपडेट करना जरूरी है। बुजुर्गों को तकनीक से दूर रखने के बजाय, अगर उन्हें इसका साथी बना दिया जाए, तो पीढ़ियों का फासला एक 'क्लिक' में खत्म हो सकता है।
