दौलत तो दी पर संस्कार नहीं: एक माँ के आंसुओं का कड़वा सच

दौलत तो दी पर संस्कार नहीं: एक माँ के आंसुओं का कड़वा सच

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तुलसी के चौरे पर कड़वी सुबह

सूरज की पहली किरण अभी हवेली के बड़े आंगन में उतरी ही थी। कौशल्या देवी ने अभी-अभी तुलसी जी को जल चढ़ाया था और अपने पल्लू से हाथ पोंछते हुए उन्होंने देखा कि उनका बेटा, विक्रांत, बड़ी हड़बड़ी में बुलेट स्टार्ट कर रहा है। समय सुबह के छह भी नहीं बजा रहा था। माँ का मन तो आखिर माँ का होता है, उनसे रहा नहीं गया।

“लल्ला, अरे बेटा... इतनी सुबह-सुबह खाली पेट कहाँ भाग रहा है? दो घूँट चाय तो पीता जा, तेरे बाबूजी भी उठने वाले हैं...” कौशल्या जी ने बड़े लाड़ से पुकारा।

किक मारते हुए विक्रांत का पैर रुका और उसने झल्लाकर पीछे मुड़कर देखा। उसके माथे पर बल पड़ गए। “उफ्फ माँ! क्या आप भी... हजार बार कहा है कि जब मैं निकला करूँ तो पीछे से टोका मत करो। अपशकुन होता है, पर आपको तो समझ ही नहीं आता। कोई दूध पीता बच्चा नहीं हूँ मैं, जो भूख लगेगी तो रोऊँगा। बाहर खा लूँगा... पूरा मूड ही खराब कर दिया सुबह-सुबह।”

इतना कहकर विक्रांत ने जोर से एक्सीलेटर घुमाया और धूल का गुबार छोड़ता हुआ फाटक से बाहर निकल गया। कौशल्या जी वहीं खंभे का सहारा लेकर खड़ी रह गईं। उनके हाथ का लोटा कांप गया। कलेजे पर जैसे किसी ने पत्थर मार दिया हो।

मौन गवाह और अतीत की परछाइयाँ

पास ही चारपाई पर बैठी कौशल्या की ननद, सरिता बुआ, यह सब देख रही थीं। वे अपने भतीजे केशव (विक्रांत के चचेरे भाई) के मुंडन संस्कार के लिए मायके आई हुई थीं। सरिता ने देखा कि कैसे भाभी अपनी आँखों में आए आंसुओं को पल्लू की कोर से सोखने की नाकाम कोशिश कर रही हैं।

सरिता का मन भर आया, लेकिन साथ ही अतीत की वो तस्वीरें भी आँखों के सामने नाचने लगीं, जो इस वर्तमान की नींव थीं। यह वही कौशल्या भाभी थीं, जिन्होंने ससुर जी (सरिता के पिता) के गुजरते ही घर में कोहराम मचा दिया था। “हवेली का बंटवारा अभी होगा,” उनकी जिद के आगे माँ को झुकना पड़ा था।

सरिता को याद आया कि कैसे कौशल्या भाभी ने पुश्तैनी आढ़त और पक्की हवेली का मुख्य हिस्सा अपने और बड़े भैया के नाम करवा लिया था। और हिस्से में आई थी बेचारी छोटी भाभी, सुनंदा। सुनंदा को पिछवाड़े का कच्चा हिस्सा और थोड़ी सी बंजर जमीन मिली थी।

बावजूद इसके, सुनंदा ने कभी उफ नहीं की। उसने देवरानी होने का हर फर्ज निभाया। लेकिन वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि छोटे भैया एक बीमारी में चल बसे। सुनंदा पर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। दो छोटे बेटे और एक बेटी... सिर पर न पिता का साया, न घर में आमदनी। उस वक्त कौशल्या भाभी ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया था कि “हम अपना देखें या इनका? सबके अपने-अपने कर्म हैं।”

मिट्टी और सोना

सरिता बुआ यादों में डूबी हुई थीं। छोटी भाभी सुनंदा ने रात-रात भर जागकर पापड़-बड़ियां बनाईं, दूसरों के कपड़ों की सिलाई की। खुद रूखा-सूखा खाया, लेकिन बच्चों को संस्कार और शिक्षा दोनों दी। सुनंदा के बच्चे, केशव और मयंक, सरकारी स्कूल में पढ़कर भी आज जिले के बड़े अधिकारी बन गए थे। इतना बड़ा ओहदा पाने के बाद भी जब वे घर आते, तो सबसे पहले घर की देहरी पूजते और बड़ों के पैरों में सिर रखते।

और दूसरी तरफ यह विक्रांत था। पिता की जमी-जमाई आढ़त और पैसों की गर्मी ने उसे घमंडी बना दिया था। उसे लगता था कि दुनिया उसकी जेब में है। कौशल्या भाभी ने लाड़-प्यार में उसे कभी ‘ना’ सुनना सिखाया ही नहीं। नतीजा आज सामने था—’बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहाँ से होय’।

कौशल्या जी ने खुद को संभाला और सरिता की ओर मुड़कर एक फीकी मुस्कान दी, “आजकल काम का बोझ बहुत है न लल्ला पर... इसलिए जरा चिड़चिड़ा हो गया है। वैसे दिल का बुरा नहीं है।”

फूटा हुआ घड़ा

सरिता ने हाथ में ली हुई माला नीचे रख दी। “भाभी, क्या सच में? क्या यह सिर्फ काम का बोझ है? मैंने अभी सुना उसने आपसे कैसे बात की।”

ननद की सधी हुई आवाज सुनकर कौशल्या का सब्र टूट गया। जो बात उन्होंने सालों से सीने में दबा रखी थी, वह आंसुओं के साथ बह निकली। वह चारपाई के कोने पर बैठ गईं।

“क्या बताऊँ सरिता... मेरी तो किस्मत ही फूटी है। यह लड़का किसी की नहीं सुनता। न मेरी, न तुम्हारे भैया की। और तो और, वो जो बहू आई है, वो तो हमसे सीधे मुंह बात भी नहीं करती। दोनों ऊपर की मंजिल पर अपनी दुनिया बसाए बैठे हैं। हमारे लिए तो बस इतना ही है कि वक्त पर दो रोटियां नीचे भिजवा देते हैं, जैसे किसी भिखारी को दे रहे हों।”

कौशल्या जी सिसकते हुए बोलीं, “डर लगता है सरिता, अगर कुछ ज्यादा कह दिया तो कहीं ये हमें छोड़कर शहर न चले जाएँ। बुढ़ापे में हम कहाँ जाएंगे? यही सोचकर चुप रह जाते हैं। समाज में नाक न कटे, इसलिए हंसकर सब सहते हैं। तुम ही बताओ, हमने क्या कमी छोड़ी थी इसके लाड़-प्यार में?”

विरासत और संस्कार

सरिता ने कौशल्या के हाथ पर अपना हाथ रखा। उनकी आँखों में सहानुभूति तो थी, लेकिन साथ ही एक कड़वा सच भी।

“भाभी, बुरा मत मानना, लेकिन लाड़-प्यार और संस्कारों में बहुत अंतर होता है। आपने उसे वो सब दिया जो पैसे से खरीदा जा सकता था, लेकिन वो नहीं दिया जो पसीने और संघर्ष से मिलता है।”

सरिता ने सामने तुलसी के पौधे की ओर इशारा करते हुए कहा, “देखिए भाभी, सुनंदा भाभी के पास धन नहीं था, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों को संघर्ष की आंच में तपाया। उन्होंने बच्चों को सिखाया कि झुकना कमजोरी नहीं, विनम्रता है। और आपने? आपने विक्रांत की हर गलती पर पर्दा डाला। आज वही पर्दा आपकी आंखों से हट रहा है।”

कौशल्या निशब्द रो रही थीं। सरिता ने अपनी बात खत्म की, “जमीन-जायदाद, हवेली और दुकानें... ये सब वसीयत में मिल सकते हैं भाभी, लेकिन संस्कार विरासत में नहीं मिलते। उन्हें तो बचपन से ही बच्चे के मन में रोपना पड़ता है, जैसे किसान फसल को सींचता है। अब फसल पक चुकी है, अब उसमें बदलाव नहीं हो सकता।”

सीख: बच्चों को केवल सुख-सुविधाएं देना ही माता-पिता का कर्तव्य नहीं है, बल्कि उन्हें अच्छे संस्कार, विनम्रता और बड़ों का सम्मान करना सिखाना सबसे बड़ी पूंजी है। धन विरासत में मिल सकता है, लेकिन चरित्र निर्माण स्वयं करना पड़ता है।

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