अनकही दूरियाँ
शाम की हल्की धूप बरामदे में बिछी हुई थी। सुमन अपने लैपटॉप से नज़रें हटाकर जैसे ही पानी पीने उठी, उसकी नज़र मुख्य द्वार पर पड़ी। वहाँ खड़ी आकृति को देखते ही उसकी आँखों में चमक आ गई। वह दौड़ती हुई बाहर आई और पैर छूते हुए बोली—
“अरे ताई जी, आप! आप और ताऊ जी गाँव से कब आए? मैं तो न जाने कब से आपसे मिलने रामपुर आने की सोच रही थी, लेकिन ऑफिस और घर की उलझनों में ऐसी फँसी कि निकल ही नहीं पाई। कभी मेरी छुट्टी होती तो पतिदेव को काम होता, कभी उन्हें छुट्टी मिलती तो मुझे नहीं। पर आप तो गजब करती हैं, शहर आईं और बताया भी नहीं? इतने महीनों बाद आपको देख रही हूँ, कलेजे को ठंडक मिल गई।”
सुमन की बातों में एक अपनापन था, एक तड़प थी। लेकिन ताई जी, यानी सरोजिनी देवी के चेहरे पर वो पुरानी मुस्कान नदारद थी। उन्होंने रूखा सा जवाब दिया—
“हाँ बस, आना हुआ तो सोचा मिलती चलूँ।”
सुमन अभी और सवाल पूछती, तभी रसोई से उसकी जेठानी वंदना बाहर निकली। उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं, लेकिन उसने संभलते हुए कहा—
“अरे सुमन! अब क्या ताई जी को दरवाजे पर ही खड़ा रखोगी? सिर्फ बातें ही बनाओगी या उनके लिए कुछ ठंडा-गर्म भी लाओगी? अंदर ले आओ उन्हें।”
“हाँ भाभी, मैं अभी चाय बनाती हूँ, अदरक वाली। ताई जी को वही पसंद है,” सुमन चहकते हुए रसोई की ओर भाग गई।
सरोजिनी देवी मन ही मन सोचने लगीं— ‘यह बहू कह रही है कि मैं गाँव से कब आई? इसे किसने कहा कि मैं गाँव में थी? पिछले छह महीने से तो हम यहीं शहर के पुराने वाले मकान में रह रहे हैं। वंदना तो कहती थी कि सुमन के पास वक्त नहीं है, वह हमसे मिलना नहीं चाहती। फिर आज यह गाँव की रट क्यों लगा रही है?’
रसोई की सियासत
सरोजिनी देवी, सुमन और वंदना की सगी सास नहीं थीं। वे उनके ताऊ जी की पत्नी थीं। सुमन के ससुर और सास का देहांत बहुत पहले हो गया था। सरोजिनी देवी की अपनी कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने अपने देवर के दोनों बेटों—रवि (सुमन का पति) और उसका बड़ा भाई (वंदना का पति)—को अपने बच्चों की तरह पाला था। शादी-ब्याह के सारे नेग और जिम्मेदारियाँ उन्होंने ही निभाई थीं। सुमन उन्हें माँ समान मानती थी, लेकिन बड़ी बहू वंदना के मन में हमेशा एक खटास और असुरक्षा रहती थी।
सुमन चाय की ट्रे लेकर आई। कप की खनक के साथ उसने पूछा—
“लीजिए ताई जी। वैसे ताऊ जी नहीं दिख रहे? और आप गाँव से सीधे यहीं आईं या कहीं और रुकी हैं?”
सुमन का सवाल अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि वंदना ने टोका—
“सुमन, चाय ठंडी हो रही है। और तुम तो जानती हो ताई जी को ज्यादा बातें करना पसंद नहीं। तुम अपना ऑफिस का काम भी तो कर रही थी, वो मीटिंग थी न तुम्हारी?”
जब भी सरोजिनी देवी कुछ बोलने को होतीं, वंदना बात काट देती। दोपहर से शाम हो गई। सुमन बीच-बीच में लैपटॉप छोड़कर आती, दो बातें करती, और फिर वंदना उसे किसी काम में उलझा देती।
शक की सुई
शाम गहराने लगी थी। ताऊ जी, जो पास के पार्क में टहलने गए थे, वापस आ गए। उनके आते ही सरोजिनी देवी ने उठते हुए कहा—
“अच्छा बहू, अब हम चलते हैं। अँधेरा हो रहा है।”
सुमन चौंकी, “चलते हैं? मतलब? आप लोग आज यहाँ नहीं रुकेंगे? इतनी रात को गाँव कैसे जाएँगे? गाड़ी तो सुबह मिलती है न?”
सरोजिनी देवी ने झिड़कते हुए कहा, “कौन से गाँव की बात कर रही हो? हमें तो बस सुभाष नगर जाना है, यहाँ से ऑटो लेकर चले जाएँगे। पेंशन के काम से शहर आए थे, सोचा मिल लें।”
सुमन अवाक रह गई। “सुभाष नगर? आप लोग शहर वाले पुराने घर में हैं? और मुझे पता भी नहीं? वंदना भाभी ने तो कहा था आप लोग हमेशा के लिए गाँव शिफ्ट हो गए हैं।”
वंदना का चेहरा पीला पड़ गया। वह कुछ सफाई देती, उससे पहले ही सुमन अपने कमरे की ओर भागी और एक सुंदर सा पैकेट लेकर आई।
“ताई जी, रुकिए। पिछले महीने मेरे छोटे भाई की शादी थी। पापा ने बहुत जिद करके यह साड़ी और ताऊ जी के लिए कुर्ता भेजा है। मैं तो कुरियर करने वाली थी गाँव के पते पर, अच्छा हुआ आप मिल गईं।”
कपड़ों का पैकेट देखते ही सरोजिनी देवी का सब्र का बाँध टूट गया। उन्होंने पैकेट को हाथ भी नहीं लगाया और कड़वाहट से बोलीं—
“रहने दे सुमन। यह दिखावा करने की क्या ज़रूरत है? तेरे भाई की शादी हो गई, पूरा समारोह हो गया, और हमें एक कार्ड तक नहीं मिला? अब यह कपड़ा देकर हमारे जख्मों पर नमक छिड़क रही है? तुम्हारे मायके वालों ने बता दिया कि ताऊ-ताई की औकात माँ-बाप जैसी नहीं होती।”
ताऊ जी ने उन्हें शांत करने की कोशिश की, “अरे भाग्यवान, छोड़ो इन बातों को। बच्चे हैं, भूल हो गई होगी। उपहार रख लो और चलो।”
सुमन की आँखों में आँसू आ गए। वह हक्का-बक्का रह गई।
“निमंत्रण नहीं दिया? ताई जी, यह आप क्या कह रही हैं? पापा ने सबसे पहला कार्ड आपके नाम का ही तो भेजा था। मैंने खुद भाभी को दिया था कि वो आप तक पहुँचा दें क्योंकि उस वक्त मैं ऑफिस टूर पर थी। और मैंने कितनी बार आपको फोन किया, पर आपका नंबर हमेशा ‘गलत’ बताता रहा।”
नकाब उतरा
सुमन का फोन बजने लगा। ऑफिस से जरूरी कॉल थी। उसने हाथ जोड़कर कहा, “ताई जी, मुझे बस पाँच मिनट दीजिए। आप बिना खाना खाए नहीं जा सकतीं। और यह गलतफहमी मुझे दूर करनी ही होगी।” वह भारी मन से कमरे में गई।
सुमन के जाते ही वंदना ने फुसफुसाते हुए कहा, “ताई जी, आप निकलिए। यह तो नाटेगी। ऑफिस के काम में इसे घंटों लग जाएँगे। मैं बाद में समझा दूँगी।”
लेकिन सरोजिनी देवी कच्ची गोलियाँ नहीं खेली थीं। सुमन की आँखों की सच्चाई और वंदना की घबराहट ने उन्हें सब कुछ समझा दिया था। उन्होंने अपना थैला वापस सोफे पर रख दिया।
“नहीं बड़ी बहू। आज मैं नहीं जाऊँगी। आज तो दूध का दूध और पानी का पानी होकर रहेगा। मुझे जानना है कि आखिर मेरा नंबर ‘गलत’ क्यों बता रहा था और शादी का कार्ड मेरे घर के बदले कूड़ेदान में कैसे गया?”
वंदना के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। ताऊ जी ने भी अब कड़े स्वर में पूछा, “वंदना, क्या सच है? सुमन तो झूठ बोलने वाली लड़की नहीं है।”
सरोजिनी देवी ने वंदना की आँखों में आँखें डालकर कड़क आवाज में पूछा, “बोल बहू! क्या चाल है यह? तू हम दोनों को सुमन से क्यों दूर करना चाहती है? पिछले छह महीने से तू हमारे कान भर रही थी कि सुमन घमंडी हो गई है, हमसे बात नहीं करना चाहती। उधर सुमन से झूठ बोला कि हम गाँव चले गए। क्यों?”
वंदना अब घिर चुकी थी। वह सोफे पर बैठ गई और रोने का नाटक करते हुए बोली—
“ताई जी, मुझे माफ कर दीजिए। मुझे डर था… मुझे बहुत डर था।”
“किस बात का डर?”
“यही कि आप और ताऊ जी अपनी सारी पैतृक संपत्ति और वो पुस्तैनी गहने सुमन और रवि के नाम न कर दें। सुमन हमेशा मीठा बोलकर आप लोगों का दिल जीत लेती है। उसके मायके वाले भी आपको बहुत मानते हैं। मुझे लगा कि अगर मैं दूरियाँ नहीं बढ़ाऊँगी, तो मेरे हिस्से कुछ नहीं आएगा। इसलिए मैंने सुमन के फोन में आपका नंबर बदल दिया और आपका कार्ड भी छिपा लिया।”
यह सुनकर सरोजिनी देवी ने अपना माथा पीट लिया।
“अरे मूर्ख औरत! तूने चंद रुपयों और ज़मीन के टुकड़ों के लिए रिश्तों का खून कर दिया? हम तो जीते-जी दोनों बेटों को बराबर का हिस्सा देने की वसीयत तैयार करवा चुके थे। लेकिन तूने अपनी ही नज़र में खुद को गिरा लिया।”
वंदना उनके पैरों में गिर पड़ी। “ताई जी, सुमन को मत बताइएगा। वो मेरी शक्ल नहीं देखेगी।”
सरोजिनी देवी ने उसे परे हटाते हुए कहा, “इज्ज़त कमाई जाती है, बहू, छीनी नहीं जाती। सुमन को तो मैं सच बताऊँगी, ताकि भविष्य में वह ‘सांप को दूध पिलाने’ वाली गलती न करे। रिश्तों में पारदर्शिता होनी चाहिए, चाहे वह कड़वी ही क्यों न हो।”
सुमन कमरे से बाहर आई तो माहौल बदला हुआ था। ताई जी ने उसे गले लगाया, और उस आलिंगन में महीनों की दूरियाँ पलों में सिमट गईं। वंदना कोने में खड़ी अपनी लालच की राख को देख रही थी।
सीख: संपत्ति का मोह और ईर्ष्या हरे-भरे रिश्तों को भी बंजर बना देती है। झूठ की बुनियाद पर खड़े रिश्ते ताश के पत्तों की तरह बिखर जाते हैं, जबकि सच्चाई और प्रेम का बंधन ही स्थायी होता है।
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