सगी बहन का धोखा: मन की गांठ ने तोड़ा खून का रिश्ता

सगी बहन का धोखा: मन की गांठ ने तोड़ा खून का रिश्ता

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उम्मीदों का दीया और गाँव की मिट्टी

बरसात की पहली फुहारों से गाँव की मिट्टी महक रही थी, ठीक वैसे ही जैसे सुमन का मन आज महक रहा था। हाथ में सरकारी शिक्षक भर्ती का पत्र थामे वह दौड़ती हुई अपनी माँ के पास रसाईघर में पहुँची। चूल्हे पर चढ़ी दाल की खुशबू के बीच सुमन ने जब माँ को बताया कि उसकी लिखित परीक्षा पास हो गई है और अब साक्षात्कार (इंटरव्यू) के लिए उसे बनारस जाना है, तो माँ की आँखों में खुशी के आँसू छलक आए।

सुमन के लिए यह नौकरी सिर्फ एक पद नहीं, बल्कि अपनी पहचान बनाने का एक जरिया थी। गाँव के छोटे से स्कूल में पढ़कर उसने यह मुकाम हासिल किया था। बनारस का नाम सुनते ही सुमन के चेहरे पर एक अलग ही चमक आ गई। वहाँ उसकी बड़ी बहन कुसुम रहती थी। कुसुम दीदी की शादी को पाँच साल हो चुके थे, और गृहस्थी की व्यस्तता के कारण सुमन उनसे मिल नहीं पाती थी।

सुमन ने मन ही मन सोचा, "चलो, एक पंथ दो काज हो जाएँगे। इंटरव्यू भी हो जाएगा और दीदी के साथ कुछ दिन हँसी-ठिठोली भी कर लूँगी।" उसे क्या पता था कि बचपन की यादें अब बड़ी हो चुकी हैं और उनमें ईर्ष्या की दीमक लग चुकी है।

बहन के मन की गाँठ

सुमन ने बड़े उत्साह से अपनी पुरानी संदूक से दीदी के लिए उनका पसंदीदा आम का अचार और घर के बने लड्डू निकाले। माँ ने कहा, "अरे, पहले कुसुम को फोन तो कर ले, सरप्राइज देने के चक्कर में कहीं वो घर पर न मिले तो?"

कुसुम, जो कि रंग-रूप में सुमन से बहुत सुंदर और गोरी थी, हमेशा से ही घर की लाड़ली रही थी। लेकिन पढ़ाई में सुमन अव्वल थी, जबकि कुसुम का मन किताबों में कम और श्रृंगार में ज्यादा लगता था। कुसुम की शादी एक अच्छे व्यापारी परिवार में हुई थी, लेकिन उसके मन में हमेशा यह टीस रहती थी कि साँवली होने के बावजूद सुमन पढ़ाई में उससे आगे क्यों है। उसे लगता था कि अगर सुमन अफसर बन गई, तो समाज में उसकी (कुसुम की) नाक नीची हो जाएगी।

सुमन ने उत्साह से फोन मिलाया।

सुमन: "प्रणाम दीदी! कैसी हैं आप और जीजाजी?"

कुसुम: (रूखे स्वर में) "हम सब ठीक हैं सुमन। कहो, आज कैसे याद किया? गाँव में सब कुशल मंगल तो है?"

सुमन: "दीदी, एक बहुत बड़ी खुशखबरी है। मेरा चयन सरकारी टीचर की भर्ती के लिए हो गया है। अगले हफ्ते मेरा इंटरव्यू है और वो भी आपके शहर बनारस में!"

उधर फोन पर कुछ पल की खामोशी छा गई। कुसुम के लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं थी। उसने मन ही मन सोचा, "अगर यह यहाँ आ गई और नौकरी लग गई, तो मेरी तो कोई पूछ ही नहीं रहेगी। सारे रिश्तेदार इसी के गुण गाएंगे।"

कुसुम: "अरे! पर टीचर की नौकरी में रखा ही क्या है? इतनी दूर धक्के खाने आएगी? माँ-बापूजी से कह कि तेरे लिए लड़का ढूँढें। शादी के बाद चूल्हा-चौका ही तो करना है, ये नौकरी-चाकरी ससुराल वाले नहीं करने देते।"

सुमन: "दीदी, वो सब बाद में सोचेंगे। अभी तो मैं बस आपसे मिलने के लिए उत्साहित हूँ। इंटरव्यू के बहाने चार दिन आपके पास रह लूँगी, बहुत मन है आपके हाथ की अदरक वाली चाय पीने का।"

झूठ की दीवार

कुसुम को लगा जैसे कोई जबरदस्ती उसके घर में घुसना चाह रहा हो। उसने तुरंत एक झूठ गढ़ दिया।

कुसुम: "अरे सुमन! तूने पहले क्यों नहीं बताया? हम तो अगले हफ्ते ही 'चार धाम' की यात्रा पर निकल रहे हैं। घर पर ताला लगा रहेगा। हम तो शहर में होंगे ही नहीं।"

सुमन का उत्साह जैसे ठंडे पानी में मिल गया।

सुमन: (मायूस होकर) "अच्छा... कोई बात नहीं दीदी। शायद किस्मत में अभी मिलना नहीं लिखा। आप लोग यात्रा पर जा रहे हैं, यह तो अच्छी बात है।"

कुसुम: "हाँ, अब टिकट बुक हो गए हैं तो कैंसिल भी नहीं कर सकते। तू ऐसा कर, इंटरव्यू छोड़ दे। अगली बार देख लेना, वैसे भी अनजान शहर में अकेली कहाँ-कहाँ भटकोगी?"

कुसुम ने फोन रख दिया। सुमन की आँखों में आँसू थे। उसे दीदी के बाहर जाने का दुख नहीं था, बल्कि उनके स्वर में जो बेरुखी थी, वो उसके दिल को चीर गई थी। यह तो जले पर नमक छिड़कने जैसा था।

मित्रता का आँचल

सुमन ने हार नहीं मानी। उसे याद आया कि उसकी कॉलेज की सहेली वाणी की शादी भी बनारस में ही हुई थी। वाणी और सुमन का रिश्ता खून का नहीं, पर दिल का गहरा था। संकोच करते हुए उसने वाणी को फोन मिलाया।

वाणी की खुशी का ठिकाना न रहा।

वाणी: "सुमन! तू पगली है क्या? मुझसे पूछ रही है कि आऊँ या नहीं? यह तेरा ही घर है। तू बस ट्रेन में बैठ, स्टेशन पर मेरे पति तुझे लेने आएँगे। हम दोनों मिलकर गंगा आरती देखेंगे और तुझे इंटरव्यू की तैयारी भी करवाऊँगी।"

वाणी की बातों ने सुमन के जख्मों पर मरहम लगा दिया। नियत दिन सुमन बनारस पहुँची। वाणी ने उसका स्वागत ऐसे किया जैसे कोई सगी बहन बरसों बाद मायके लौटी हो।

काशी के घाट पर सच का सामना

अगले दिन शाम को वाणी, सुमन को लेकर दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती दिखाने ले गई। घाट पर दीयों की रोशनी और घंटियों की गूँज मन को शांति दे रही थी। तभी भीड़ में सुमन की नजर एक जानी-पहचानी साड़ी पर पड़ी।

उसने ध्यान से देखा। वो कुसुम दीदी थीं! वे अपने पति और बच्चों के साथ चाट-पकौड़ी का आनंद ले रही थीं। न कोई यात्रा का सामान, न कोई जल्दबाजी। वे तो मजे से शहर में ही घूम रही थीं।

सुमन के कदम ठिठक गए। वाणी ने उसकी नजर का पीछा किया और समझ गई।

वाणी: "सुमन, वो तेरी दीदी हैं न? चल, जाकर मिलते हैं। शायद उनका प्लान कैंसिल हो गया हो।"

सुमन ने वाणी का हाथ पकड़कर रोक लिया। उसकी आँखों में अब आँसू नहीं, एक समझदारी थी।

सुमन: "नहीं वाणी, रहने दे। उन्होंने मुझसे कहा था कि वो शहर में नहीं हैं। अगर मैं अभी सामने गई, तो उनका झूठ पकड़ा जाएगा और वो शर्मिंदा होंगी। जिसका मन ही मेरे लिए साफ नहीं है, उससे मिलकर मैं क्या करूँगी? कहते हैं न, मुँह में राम, बगल में छुरी, ऐसे रिश्तों से दूरी ही भली।"

नई शुरुआत

सुमन ने अपना पूरा ध्यान इंटरव्यू पर लगाया। उसका आत्मविश्वास और वाणी का सहयोग रंग लाया। उसका चयन हो गया। उसी शहर में, जहाँ उसकी बहन ने उसे अपनाने से इनकार कर दिया था, सुमन ने अपनी नई दुनिया बसाई।

उसने अपनी नियुक्ति की खबर घर पर दी, लेकिन कुसुम दीदी को अलग से फोन नहीं किया। उसे समझ आ गया था कि खून के रिश्ते ईश्वर बनाता है, लेकिन दिल के रिश्ते इंसान खुद चुनता है। वाणी जैसी सहेली ने साबित कर दिया था कि कभी-कभी पराये भी अपनों से बढ़कर होते हैं।

सीख:

रिश्तों की अहमियत खून से नहीं, बल्कि भावना और बुरे वक्त में साथ देने से होती है। ईर्ष्या सगे रिश्तों को भी खोखला कर देती है, जबकि निस्वार्थ प्रेम अनजानों को भी अपना बना लेता है।

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