कचहरी के पुराने पीपल के नीचे: एक अंतिम मुलाकात
बनारस की जिला कचहरी के बाहर, उस पुराने पीपल के पेड़ के नीचे खड़ा राघव आज एक अजीब सी शांति महसूस कर रहा था। उसके चेहरे पर वो सुकून था जो बरसों से गायब था। कल फैसले का दिन था। उसने मीरा की सारी शर्तें मान ली थीं, चाहे वो कितनी भी अनुचित क्यों न हों।
जज साहिबा ने अंतिम मोहर लगाने से पहले, एक मानवीय पहल करते हुए राघव और मीरा को दस मिनट अकेले में बात करने का समय दिया था। शायद उन्हें लगा हो कि टूटते हुए रिश्ते की कोई डोर अब भी बची हो। पीपल की छांव में, मीरा ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए, डबडबाई आँखों से राघव की ओर देखा और कहा - "राघव, मुझे माफ़ कर दो। मैं उस वक़्त नादान थी, विकास ने मुझे अपनी बातों में फंसा लिया था। एक औरत का घर उजड़ जाए तो समाज उसे जीने नहीं देता।"
राघव ने उसकी ओर देखा, लेकिन उसकी आँखों में अब वो पुराना प्रेम नहीं, बल्कि एक शमशान जैसी वीरानगी थी। मीरा ने फिर रोते हुए कहा - "तुम इतने पत्थर दिल कैसे हो सकते हो? मेरे बाबूजी ने तुम्हारे सामने कितनी बार हाथ जोड़े। मैं अपनी गृहस्थी फिर से बसाना चाहती हूँ। मेरी बहनों को ताने सुनने पड़ते हैं। एक बार सोचो तो सही।"
तभी वहां खड़ी महिला वकील ने भी दबी जुबान में कहा, "राघव जी, पुरानी बातें भूलकर, 'बीती ताहि बिसार दे' वाली कहावत अपनाइये और नई शुरुआत कीजिये।"
राघव कड़वाहट से मुस्कुराया। उसने गहरी सांस ली और कहा - "वकील साहिबा, मेरी गृहस्थी और मेरी जिंदगी तो उसी काली रात को ख़त्म हो गई थी, जब यह औरत, जिसे मैंने अर्धांगिनी माना था, मेरे घर की लक्ष्मी बनकर नहीं, बल्कि आस्तीन का सांप बनकर मेरी माँ को जहर देकर अपने प्रेमी के साथ भाग गई थी। अगर मेरी माँ को उस दिन अस्पताल पहुँचने में थोड़ी भी देर हो जाती, तो मैं आज यहाँ खड़ा न होता, बल्कि जेल में इसकी हत्या के जुर्म में होता। मुझे बस इस रिश्ते से आज़ादी चाहिए, चाहे इसकी कीमत मेरी जान ही क्यों न हो।"
अतीत के पन्नों में: एक सुनहरे सपने का अंत
राघव को आज भी वो दिन याद है जब उसकी शादी तय हुई थी। पिता जी के देहांत के बाद 'अनुकंपा नियुक्ति' में क्लर्क की नौकरी मिली थी। घर में माँ, सावित्री देवी, बिलकुल अकेली पड़ गई थीं। बड़ी बहन सुधा की शादी हो चुकी थी। सावित्री देवी चाहती थीं कि घर के सूने आंगन में फिर से शहनाई गूंजे और बहु के पैरों की पायल की छन-छन सुनाई दे।
जब दीनानाथ जी अपनी बेटी मीरा का रिश्ता लेकर आए, तो सावित्री देवी को मीरा बहुत भा गई। सांवली सलोनी, बड़ी-बड़ी आँखों वाली मीरा। दीनानाथ जी को थोड़ी जल्दी थी, और सावित्री देवी को तो बस घर में रौनक चाहिए थी। चट मंगनी और पट ब्याह हो गया।
सुहागरात वाले दिन, राघव कमरे में गया तो मीरा ने घूंघट में ही कह दिया - "राघव जी, मुझे अभी मासिक धर्म (पीरियड्स) शुरू हो गए हैं। आपको पांच-छह दिन इंतज़ार करना होगा।"
राघव, जो एक समझदार पति था, उसने मुस्कुराते हुए सोने का वो हार, जो उसने बड़े अरमानों से बनवाया था, मीरा के हाथों में रख दिया और बोला - "कोई बात नहीं मीरा, तुम आराम करो। रिश्तों की नींव विश्वास और सब्र पर होती है, शरीर पर नहीं।"
दिन बीतने लगे। मीरा घर में तो रहती, पर उसका मन कहीं और ही रहता। दूसरे ही दिन उसने ताना मारा - "मेरे रिश्तेदार कह रहे थे कि पता नहीं बाबूजी ने क्या देखकर शादी कर दी। न लड़का स्मार्ट है, न बहुत पैसा है। सरकारी नौकरी भी पिता की मौत के बदले मिली है।" राघव का दिल बैठ गया, लेकिन उसने बात हंसी में टाल दी - "तुम आगे पढ़ना चाहो तो पढ़ लेना, मैं हूँ न।"
विश्वासघात की वो काली रात
शादी के तीन महीने बीत गए, लेकिन मीरा ने राघव को पति का हक़ नहीं दिया। कभी सर दर्द, कभी पेट दर्द, तो कभी रोने का नाटक। सावित्री देवी, जो अपनी बहु पर जान छिड़कती थीं, राघव को ही समझातीं - "अरे बेटा, नई-नई आई है, अभी बच्ची है। थोड़ा वक्त दे, सब ठीक हो जाएगा। दूध का जला छाछ भी फूंक कर पीता है, शायद उसे शादी से डर लगता हो।"
एक दिन बुआ के घर सत्यनारायण की कथा थी। जाने वाले दिन मीरा ने बिस्तर पकड़ लिया। "माँ जी, मेरा सर फट रहा है। आप राघव के साथ चली जाइये, समाज में क्या मुंह दिखाएंगे अगर कोई नहीं गया। मैं दवा खाकर सो जाऊंगी।"
सावित्री देवी का मन नहीं था, पर मीरा की ज़िद के आगे झुक गईं। राघव माँ को छोड़कर ऑफिस चला गया। उसने दोपहर में फ़ोन किया तो मीरा ने बताया कि अब वो ठीक है और उसका मौसेरा भाई 'विकास' उससे मिलने आया है।
शाम को जब राघव बुआ के घर से होकर वापस लौटा, तो घर में घुप अँधेरा था। "माँ... मीरा..." उसने आवाज़ लगाई, पर कोई जवाब नहीं मिला। जैसे ही बत्ती जलाई, उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। माँ, सावित्री देवी, रसोई के फर्श पर मुंह से झाग निकालती हुई अचेत पड़ी थीं।
अस्पताल के गलियारे और कड़वा सच
राघव माँ को गोद में उठाकर पागलों की तरह अस्पताल भागा। डॉक्टर ने बताया कि उन्हें खाने में 'विष' दिया गया है। राघव का दिमाग सुन्न पड़ गया। उसने मीरा को फ़ोन लगाया - 'स्विच ऑफ'। मीरा के मायके फ़ोन किया, तो पता चला वो वहां गई ही नहीं।
घर वापस आकर देखा तो अलमारियां खुली थीं। न गहने थे, न नकदी, यहाँ तक कि मंदिर में रखी माँ की जमा-पूंजी भी गायब थी। राघव को अपनी बहन सुधा से पता चला कि मीरा ने फ़ोन पर बताया था कि वो विकास के साथ अपनी बीमार मौसी को देखने जा रही है। लेकिन जांच करने पर पता चला कि विकास तो मीरा का प्रेमी था और वो दोनों सब कुछ लूटकर भाग चुके थे।
पुलिस थाने में जब दीनानाथ जी (मीरा के पिता) आए, तो वो उलटे राघव पर ही चिल्लाने लगे - "तुमने मेरी बेटी को गायब कर दिया है! मेरी बेटी ऐसी नहीं है।" लेकिन घर के हालात और पुलिस की तफ्तीश ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया।
वापसी का नाटक और राघव का निर्णय
माँ को एक महीने अस्पताल में यमराज से लड़ना पड़ा। घर का कोना-कोना उस धोखे की गवाही दे रहा था। छह महीने बाद, जब दीनानाथ जी अपनी बेटी मीरा को लेकर वापस आए, तो उनकी बेशर्मी की हद नहीं थी।
"राघव बेटा, बच्ची है, भटक गई थी। इसे माफ़ कर दो। अब ये कहीं नहीं जाएगी,"
राघव का गुस्सा ज्वालामुखी बनकर फूटा - "दीनानाथ जी, इस औरत ने मेरी माँ की जान लेने की कोशिश की। अगर आप इसे नहीं ले गए, तो मैं अभी इसी वक़्त इसके ऊपर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दूंगा, लेकिन इसे अपनी चौखट के अंदर नहीं आने दूंगा।"
मामला कोर्ट में पहुंचा। मीरा और उसके पिता ने राघव पर दहेज़ प्रताड़ना के झूठे केस ठोक दिए। वे जानते थे कि सरकारी नौकरी वाले लड़के कोर्ट-कचहरी से डरते हैं। उन्होंने भारी भरकम 'गुजारा भत्ता' (Alimony) माँगा। राघव के वकील ने कहा, "राघव, मान जाओ, केस लटकता रहेगा।"
शतरंज की आखिरी चाल
आज राघव ने कोर्ट में सब कुछ मान लिया था। उसने अपनी आधी तनख्वाह और भविष्य में मिलने वाली पेंशन का हिस्सा भी मीरा को देने के लिए हस्ताक्षर कर दिए थे। लोग उसे पागल कह रहे थे।
मीरा और उसके पिता खुश थे। उन्हें लगा उन्होंने सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को काबू कर लिया है। वे सोच रहे थे कि राघव का प्रमोशन होगा, तनख्वाह बढ़ेगी, और वे ऐश करेंगे।
लेकिन राघव के मन में एक अलग ही योजना चल रही थी। उसने मन ही मन सोचा - "मीरा, तुम्हें लगता है तुमने मुझे हरा दिया। लेकिन तुम नहीं जानती, मैं तुम्हें वो दूँगा जो तुम कभी सोच भी नहीं सकती।"
राघव का प्लान पक्का था। कोर्ट का फैसला आते ही, वह एक साल तक उसे पैसे देगा ताकि कानूनी औपचारिकता पूरी हो जाए। उसके ठीक बाद, वह अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे देगा। वी.आर.एस. (VRS) ले लेगा। अभी उसकी सेवा अवधि इतनी कम है कि उसे पेंशन मिलेगी ही नहीं। जो थोड़ा बहुत फंड मिलेगा, उसका आधा देकर वह हमेशा के लिए आज़ाद हो जाएगा।
शहर का यह मकान बेचकर, वह अपनी बूढ़ी माँ को लेकर अपने पुश्तैनी गाँव चला जाएगा और खेती करेगा। माँ के बाद सारी संपत्ति वह अपनी बहन सुधा के बच्चों के नाम कर देगा। लालच में अँधी मीरा, जिस सोने की चिड़िया (पेंशन और नौकरी) के लिए यह सारा खेल खेल रही थी, उसे अंत में सिवाय राख के कुछ नहीं मिलेगा।
राघव ने आसमान की ओर देखा। सूरज ढल रहा था, ठीक वैसे ही जैसे मीरा के लालच का सूरज जल्द ही डूबने वाला था। उसने मन ही मन माँ से कहा - "माँ, बस कल का दिन और, फिर हम आज़ाद हैं।"
सीख: विश्वास कांच की तरह होता है, एक बार टूट जाए तो जोड़ा जा सकता है, लेकिन दरारें हमेशा रहती हैं। और लालच का अंत हमेशा बुरा ही होता है। गृहस्थी प्रेम और त्याग से चलती है, छल और कपट से नहीं।
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