
असली नेता, असली इज्जत: हिंदी प्रेरक कहानी
शाम के छः बजे थे। बड़े से बंगले की बालकनी में रखी झूला-कुर्सी पर शहर के मशहूर उद्योगपति और नेता, रविन्द्र बाबू चुपचाप बैठे थे। सामने लॉन में महँगी कारों की लड़ी खड़ी थी, भीतर एसी ड्रॉइंग रूम में विदेशी सोफ़े, कीमती परदे, कमरे में जगह–जगह अवॉर्ड्स और शील्डें चमक रही थीं।
घर में नौकर–चाकरों की कमी नहीं थी, बाहर गेट पर सिक्योरिटी गार्ड्स तैनात थे, पर अजीब बात यह थी कि इतने शोर–शराबे के बीच भी आज घर बहुत सूना लग रहा था… और वे खुद बहुत अकेले।
कहने को वे बहुत इज्जतदार आदमी थे। बड़े–बड़े अफसर उन्हें सलाम करते, मीडिया के कैमरे उनके पीछे भागते, पेज–थ्री पार्टियों में उनकी मौजूदगी गरिमा की निशानी मानी जाती। वे फोन घुमाते ही काम हो जाता। लोग कहते –
“साहब ने कह दिया है, अब काम पक्का समझो।”
पर आज बालकनी में बैठी उनकी पत्नी सुमन चुपचाप इन्हीं सब बातों को सोचती हुई अंदर से उन्हें देख रही थी। उसके हाथ की चाय कई बार ठंडी हो चुकी थी, मगर वह जानती थी – अब पुराने वाले रविन्द्र नहीं रहे, जो हँसकर पूछते थे –
“अजी, आज खाना क्या बनाया है?”
अब तो बस फोन, मीटिंग, पैसा और पावर ही उनका ‘परिवार’ बन गए थे।
1. जड़ें, जो अब भी मिट्टी में हैं
रात को कमरे में अकेले बैठकर रविन्द्र बाबू का मन जाने क्यों बहुत बेचैन था। तभी अतीत की परतें धीरे–धीरे खुलने लगीं।
उन्हें अपना गाँव याद आया – कच्ची सड़कें, घर के आगे नीम का पेड़, आँगन में दादी की आवाज़। उनके दादाजी एक इज्जतदार किसान थे, कम जमीन थी पर दिल बहुत बड़ा था। पूरे गाँव में उनकी ईमानदारी और दया की मिसाल दी जाती थी।
चार बेटे थे उनके। छोटे बेटे मोहनलाल यानी रविन्द्र के पिताजी, पढ़-लिखकर अध्यापक बन गए थे। बाकी तीनों भाई खेती संभालते थे। घर में सब मिलजुलकर रहते, कम में भी बाँटकर खाते।
गाँव में कोई बीमार पड़ जाए, फसल चौपट हो जाए, किसी लड़की की शादी अटक जाए – दादाजी और पिताजी दोनों मिलकर जो बन पड़ता मदद कर देते। ‘इज्जतदार परिवार’ कहकर गाँव वाले उनकी ओर देखते थे।
फिर एक दिन मोहनलाल जी का तबादला शहर में हो गया। छोटा–सा किराए का मकान, पर दिल वही बड़ा। पड़ोसी आज भी याद करते थे कि मोहनलाल जी के घर से रोज़ कोई न कोई मदद लेकर ही लौटता था।
रविन्द्र के साथ उनका एक बड़ा भाई और दो बहनें थीं। बहनों की शादी अच्छे घरों में हो गई। बड़ा भाई एक सहकारी संस्था में क्लर्क की नौकरी करने लगा। ज़िंदगी साधारण थी, पर इज्जत और अपनापन भरपूर।
2. जब रविन्द्र ‘सबका’ था
कॉलज के दिन रविन्द्र के जीवन के सबसे खूबसूरत दिन थे। वह लंबा–चौड़ा, गोरा, हँसमुख, और सबसे बढ़कर – मददगार।
कॉलोनी में किसी बुजुर्ग की पेन्शन अटक जाए, राशन कार्ड की दिक्कत हो, बिजली–पानी के बिल का झंझट हो, प्रॉपर्टी टैक्स का मामला हो – बस, एक आवाज़ लगती –
“रविन्द्र बेटा, ज़रा साथ चलो न…”
और वह किताब बंद करके फट से तैयार। सरकारी दफ्तर में अपनी सधी हुई, आत्मविश्वासी आवाज़ में बात करता और काम करवाकर लाता।
अस्पताल में किसी मरीज़ को अटेंड करने वाला न हो, तो पूरे रात वहीं बैठा रहे; कॉलज के किसी गरीब दोस्त की फीस न भर पाए तो दूसरों से बात करके चंदा इकट्ठा करवा दे – ऐसे छोटे–छोटे कामों में ही उसे अपनी असली खुशी मिलती थी।
पड़ोस की जानकी भुआ तो उसे अपना बेटा ही मानती थीं। जब भी घर में कुछ अच्छा पकता, उसकी थाली अलग से रखतीं –
“पहले मेरे रविन्द्र को दो, फिर सबको देना।”
उनके आँगन में खेलते–खेलते ही वह बड़ा हुआ था।
कॉलज में भी वही हाल – हर किसी का ‘रविन्द्र भैया’ या ‘रविन्द्र भाई’। लड़के–लड़कियाँ सब उसे पसंद करते थे, पर उसकी नज़र में सब बराबर थे।
यही बात शहर के सबसे रईस घर के बिगड़ैल बेटे निलेश को चुभती थी। महँगी कारें, ब्रांडेड कपड़े, नाइट पार्टियाँ – उसी में वह अपनी शान समझता।
वह सोचता, पैसा और स्टेटस दिखाकर सबको अपनी तरफ खींच लेगा, मगर कॉलज के ज़्यादातर बच्चे फिर भी रविन्द्र के साथ ही रहते।
3. एक ताना, जिसने रास्ता बदल दिया
एक दिन कैंटीन में बैठे–बैठे निलेश ने व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ कहा –
“रविन्द्र, दिन भर लोगों के पीछे भागते रहते हो उनके छोटे–छोटे काम कराने। अगर मैं चाहूँ न, तो पापा का एक फोन जाएगा, और काम घर बैठे हो जाएगा। पैसा बहुत बड़ी चीज़ है, समझे?”
बात तो छोटी–सी थी, पर तीर सी जा लगी।
रविन्द्र उस दिन चुप ही रहा, लेकिन रात को बिस्तर पर लेटे–लेटे वही शब्द उसके कान में गूँजते रहे – “पैसा बहुत बड़ी चीज़ है…”
उसी समय देश में चुनावी माहौल गरमा रहा था। शहर की एक पार्टी ने उसके मिलनसार स्वभाव और लोकप्रियता को देखकर उसे टिकट ऑफर कर दिया। दोस्तों ने भी कहा –
“तू ही तो असली नेता बनेगा, तेरे जैसा कोई नहीं।”
पहले तो उसने मना किया, पर कहीं न कहीं दिल में यह बात घर कर चुकी थी कि – “पैसा होगा तो ही बात बनेगी।”
आख़िरकार वह चुनाव में खड़ा हो गया। मोहल्ले के लोग, कॉलज के साथी, पड़ोसी, पुराने जानने वाले – सबने बढ़–चढ़कर उसका साथ दिया।
परिणाम आया तो वह भारी बहुमत से जीत चुका था।
4. इज्जत से ज़्यादा ‘ओहदा’ बड़ा हो गया
जैसे–जैसे कुर्सी बड़ी होती गई, रविन्द्र बाबू का दिल छोटा होता गया।
अब उसके आसपास सच्चे दोस्त नहीं, बल्कि चमचे जमा हो गए थे। हर समय लोग सिर्फ अपने मतलब से उसके आगे–पीछे घूमते।
सुमन ने कितनी बार ध्यान दिलाया –
“सुनिए, मोहल्ले वाली विमला चाची का बेटा बीमार है, आपने वादा किया था अस्पताल में किसी से बात करेंगे…”
वह फोन पर किसी बड़े कॉन्ट्रैक्ट की डील में उलझा रहता –
“हाँ-हाँ, देखेंगे… अभी बहुत ज़रूरी मीटिंग है।”
जो आदमी कभी नंगे पाँव भागकर बुजुर्गों की मदद के लिए निकल जाता था, वही अब अपने एयर-कंडीशंड ऑफिस से बाहर निकलने में भी समय गँवाता था।
अब उसके लिए इज्जत और इंसानियत की जगह ‘स्टेटस’ और ‘पीआर’ ने ले ली थी। गरीबों की पुकार, बूढ़ों की दुआएँ, पड़ोसी की तकलीफ – सब उसकी दुनिया से धीरे–धीरे गायब हो गए।
घर में भी दूरी बढ़ती गई। सुमन की बातें, बच्चों के नखरे, बूढ़ी माँ की दवाइयाँ – सब ‘स्टाफ’ के जिम्मे छोड़ दिए गए।
5. एक रात, एक मुलाकात… और आईने में दिखा सच
कल रात की बात थी। एक बड़े होटल में पार्टी से लौटते समय उसकी कार सिग्नल पर रुकी। रात गहरा चुकी थी। सड़क लगभग सुनसान थी।
अचानक एक कमजोर–सी बूढ़ी औरत लाठी टेकते हुए कार के सामने आकर खड़ी हो गई। ड्राइवर झुँझला गया –
“अम्मा जी, हटिए, साहब की गाड़ी है।”
रविन्द्र ने शीशे से बाहर झाँका। चेहरा कुछ जाना–पहचाना लगा, पर वह जल्दी में था। उसने ड्राइवर से कहा –
“चला, निकल आगे।”
कार थोड़ी आगे बढ़ी ही थी कि उसके दिल में हलचल–सी हुई। न जाने कौन–सी पुरानी याद ने हाथ पकड़ लिया।
“रुको… पीछे लो।”
ड्राइवर ने हैरानी से ब्रेक लगाया।
रविन्द्र खुद उतरकर उस वृद्धा के पास गया –
“माई, कुछ कहना था आपको?”
वह उसे देखकर हल्का–सा मुस्कुराई, आँखों में नमी थी –
“लौटने की सम्भावना तो अब भी है बेटा… अगर तुम सीधे निकल जाते, तो समझती मेरा पुराना रविन्द्र कहीं खो गया है।”
वह चौंका –
“आप… क्या कहना चाहती हैं माई?”
बूढ़ी औरत ने गहरी साँस ली –
“मैं उस रविन्द्र को ढूँढ रही हूँ जो हम गरीबों की आवाज़ सुनता था। जो किसी बूढ़े की मदद के लिए नंगे पाँव दौड़ जाता था, जिसे इज्जत कुर्सी से नहीं, इंसानियत से मिलती थी।
अच्छा हुआ पलटकर आ गए… वरना आज सचमुच मान लेती कि मेरा बेटा रविन्द्र अब इस दुनिया में नहीं, बस उसका नाम और चेहरा कहीं खो गया है।”
इतना कहकर वह मुड़ गई।
रविन्द्र पत्थर–सा वहीं खड़ा रह गया। उसके कानों में ‘मेरा बेटा रविन्द्र’ बार–बार गूंज रहा था।
6. जानकी भुआ – जो अब भी वहीं थीं
रात भर नींद नहीं आई। सुबह होते–होते उसने उस चेहरे को पहचान लिया –
“अरे… ये तो जानकी भुआ थीं! पड़ोस वाली जानकी भुआ, जिनकी गोद में बैठकर मैं खीर खाता था… जो मेरे लिए पकौड़े बचाकर रखती थीं…।”
वह अचानक बालकनी से उठ खड़ा हुआ। सुमन ने हैरान होकर पूछा –
“आज बिना फोन देखे कहाँ चल दिए?”
“थोड़ा पुरानी बस्ती तक जा रहा हूँ,” उसने बस इतना ही कहा।
ड्राइवर भागता हुआ आया –
“साहब, गाड़ी निकालूँ?”
“नहीं, आज पैदल ही जाऊँगा।”
कई साल बाद वह उस पुराने मोहल्ले की तरफ चला था जहाँ उसका बचपन बीता था, जहाँ सुमन ने भी उसकी माँ के साथ कई दोपहरें बिताई थीं।
वहाँ पहुँचकर उसने देखा – जहाँ उनका पुराना घर हुआ करता था, वहाँ अब सिर्फ एक खाली प्लॉट था, जिस पर कूड़े का ढेर लगा था। घर बिक चुका था, यादें नहीं।
उसने बगल वाले पुराने मकान का दरवाज़ा खटखटाया।
करीब दस साल का एक बच्चा बाहर आया –
“कौन?”
“बेटा, जानकी भुआ हैं घर पर?”
बच्चा अन्दर भागा –
“दादी, कोई आपसे मिलने आया है!”
कुछ पल बाद जानकी भुआ बाहर आईं। कमर झुक गई थी, हाथ में लकड़ी का सहारा था, पर चेहरे पर वही पुरानी ममता झलक रही थी।
रविन्द्र को देखते ही उनकी आँखें चमक उठीं –
“मुझे पता था, तू आएगा एक दिन… आ बेटा, बैठ।”
अबकी बार रविन्द्र की आँखों में आँसू थे। वह उनके चरणों में झुक गया –
“भुआ, माफ कर दो… मैं बहुत दूर चला गया था।”
जानकी भुआ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा –
“तेरा पद बड़ा हो गया है, ओहदा ऊँचा हो गया है, ये अच्छी बात है। मैं चाहती हूँ तू और ऊँचा जाए। पर बेटा, इतना मत उड़ कि ज़मीन से रिश्ता टूट जाए।
सच्चा इज्जतदार वही है जो गरीब की आँख का आँसू देख सके, असहाय का सहारा बन सके। वरना धन–दौलत तो बहुतों के पास है, मगर इज्जतदार कम ही हैं।”
सुमन भी अब तक चुपचाप वहाँ आकर खड़ी हो गई थी। उसने अपने पति को इतने साल बाद पहली बार यूँ रोते देखा। उसके मन में भी जाने कितने जमे हुए बादल फट पड़े।
7. असली बदलाव – घर से, दिल से
उस दिन के बाद से रविन्द्र बाबू की दिनचर्या बदलने लगी।
सुबह–सुबह अखबार के साथ वह अब झुग्गी–बस्ती का हाल भी लेने जाने लगा। सरकारी योजनाओं का पैसा सही जगह पहुँचे, अस्पतालों में गरीबों का इलाज हो, बुज़ुर्गों की पेंशन समय पर बने – इन सबके लिए उसने खुद मोर्चा संभाल लिया।
पार्टी मीटिंग में उसने साफ़ कहा –
“अगर मेरी कुर्सी सिर्फ पैसा कमाने का जरिया है, तो ऐसी कुर्सी मुझे नहीं चाहिए। पद और ओहदे की गरिमा तभी है जब हम असहाय के सहायक बनें।”
शुरू–शुरू में बहुत–से लोग चौंके, कुछ नाराज़ भी हुए, पर धीरे–धीरे लोगों को फिर वही पुराना ‘रविन्द्र भाई’ नज़र आने लगा, जो पहले सबका था।
घर में भी बदलाव दिखने लगा। सुमन के साथ बैठकर वह चाय पीता, बच्चों की बात सुनता, माँ की दवाइयों का खुद ध्यान रखता।
एक दिन सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा –
“पता है, अब तुम सच में इज्जतदार लगते हो… पहले तो बस बहुत अमीर लगते थे।”
रविन्द्र ने हँसते हुए जवाब दिया –
“ये इज्जत मुझे जानकी भुआ और तुम सबने वापस दिलाई है।”
संदेश
पैसा, पद, बड़ा घर, बड़ी गाड़ी – ये सब ज़िन्दगी आसान बना सकते हैं, मगर ‘इज्जतदार’ वही है जो अपने आसपास के दुख–दर्द को देखे, समझे और मदद का हाथ बढ़ाए।
इज्जत सिर्फ बैंक बैलेंस से नहीं, दिल के बैलेंस से मिलती है – कितना बाँटा, कितना लौटाया, यही असली हिसाब है।
प्रेषक – पुष्पा जोशी
स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित
विषय – #इज्जतदार
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